Home Article वीर सावरकर ने वक्तृत्व-कला कैसे सीखी ?

वीर सावरकर ने वक्तृत्व-कला कैसे सीखी ?

“ जब मैं छोटा था, तभी मेरी भाषण-प्रवृत्ति के पौधे में पहले चुल्लू भर पानी डालने की दया नासिक की उपरोक्त प्रतियोगिता ने की। अब अनेक विद्वान्, संपादक आदि मुझसे बार-बार कहते हैं कि मैंने यह वक्तृत्व-कला किस तरह सीखी, इस विषय पर मैं एक लेख लिखूँ ।

मेरे प्रथम सार्वजनिक भाषण के पूर्व अर्थात् वय के चौदहवें वर्ष के भी पहले भाषण कला सीखने में मुझे किन-किन साधनों से सहायता मिली, वही संक्षिप्त में लिख डालूँ तो अधिक कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं रहेगी, क्योंकि मेरा ज्ञानार्जन और कार्य-क्षेत्र जैसे-जैसे व्यापक होता गया, वैसे-वैसे वे साधन भी विस्तृत होते गए। उनका विस्तार तो हुआ, पर प्रकार बहुधा वही रहा।

वय के बारहवें तेरहवें वर्ष में ही मैंने वक्तृत्व कला विषय पर दो-तीन मराठी पुस्तकें पढ़ी थीं। भाषण का मूल पाठ निबंध किस तरह लिखा जाए, इसका वर्णन उन पुस्तकों में था-विषय-प्रवेश, विषय-विवेचन, पूर्व पक्ष, उत्तर पक्ष, खंडन, मंडन, संकलन, समापन इत्यादि। इस पद्धति से मैं निबंध लिखता। इससे अलग भी जो निबंध-लेखन के प्रकार भिन्न-भिन्न ग्रंथकारों के हैं, उनका भी प्रयोग करके देखता। पहले इसी क्रम से निबंध लिखना आवश्यक है। जैसे पहले क्रम से सात सुर जानना जरूरी है, वैसे ही यह है। गायक हो जाने के बाद जैसे उन सुरों को उलट-पलटकर रागदारी गाना सरल होता है, वैसे ही विषय प्रस्तुति का शास्त्र एक बार आत्मसात् हो जाने पर उसमें परिवर्तन करना अच्छा रहता है। बाद की स्थिति में तो लेखक अपनी स्वतंत्र शैली भी विकसित कर लेता है, परंतु निबंध या मूल पाठ-लेखन वास्तव में किसी व्याख्यान का द्वितीय भाग होता है।

भाषण की आत्मा तो भावना होती है। विषय से स्वयं का तादात्म्य महत्त्वपूर्ण है। इसी कारण निबंध या व्याख्यान लिखने की अपेक्षा जब मैं उसे मौखिक रूप से गढ़ता चलता हूँ, तब ही मेरा भाषण सरस होता है, क्योंकि जैसे-जैसे भावना चेतती है, वैसे-वैसे भाषा, गति, आवेश, मुद्राविकार और अभिनय यथावत् सहज प्रकट होने लगता है। परंतु यह तन्मयता जिस भाषा से यथावत् प्रकट होनी है, उस भाषा पर अधिकार होना चाहिए। उस भाषा के शब्द, अलंकार, वचन आदि सब भावना के पीछे-पीछे-अश्व के पीछे चलनेवाले पहिए की तरह सत्वर, सलिल और सहज दौड़ने चाहिए। मैंने बचपन से अनेक कविताएँ, सुभाषित आदि कंठस्थ किए थे। जिस ग्रंथ से मिले, उससे उत्तम उत्तम वाक्य, वाक्य-समूह मिलते ही लिख लिये थे और अपने निबंधों में उनका यथोचित उपयोग करने का प्रयास मैं करता रहता था। विशेषतः गद्य लिखते समय गद्य को न तोड़ते हुए उसीके प्रवाह में कविताओं के उद्धरणों का अंतर्भाव करने की रुचि मुझमें अधिक ही थी।

भावना, भाषा-शैली, अभिनय-गति आदि से भाषण खिल जाता है, यह बात सत्य होते हुए भी उसे वास्तव में परिणामकारी, प्रबल और दुर्जेय करना हो तो मुख्यतः उस विषय का ज्ञान होते हुए भी अन्य अनेक विषयों की जानकारी का बड़ा संग्रह पास में रहना चाहिए। मैं सोचता हूँ कि मेरे भाषण का जो अमोघ परिणाम

लोगों पर होता था, उसका कारण उस प्रसंग, आयु और विषय की तुलना में सहायक मेरे ज्ञान का बड़ा भंडार ही था। लिखने बैठता, तब ‘क्या लिखूँ’ की चिंता में कलम का अंतिम सिरा मुँह में डालकर चूसते रहनेवाली स्थिति मेरी कभी नहीं होती थी, उलटा यह होता कि कलम की नोक पर विषय जमघट और धक्का-मुक्की करने लगते थे। उनमें से किसे आगे बढ़ने दूँ और किसे पीछे रहने दूँ, ऐसे चौकीदार की भूमिका ही मुझे करनी पड़ती थी। इन सबका कारण बचपन से विविध विषयों का अथक वाचन, चिंतन और निरीक्षण था।

सारांश यह कि मेरी भाषण- कला की प्रतिभा का तेजस्वी आधार प्रकृतिप्रदत्त ही था। प्रकृतिप्रदत्त प्रतिभा भी अधिकतर प्रयासपूर्वक विकसित होती है और इस दिशा में मैंने अध्ययन, वाचन, चिंतन आदि प्रयत्नाधीन गुणों का संग्रह नित्य ही किया। इसलिए मेरे भाषण में जो ठोस, प्रबल और अजेय परिणाम दिखता है, वह उसीका प्रतिफल है।

संक्षेप में यह कि भाषण कला के लिए कुछ आवश्यक घटक यद्यपि मुझमें प्रकृतिप्रदत्त ही थे, फिर भी उनका विकास कर, उसे परिशोधित कर, उसे कला का लालित्य प्राप्त कराने के लिए मैंने पूरे प्रयास भी किए। यह बात सच है कि ज्ञान साधना मैंने ज्ञान-प्राप्ति के लिए ही की थी। व्याख्यानों में जो उसका उपयोग हुआ, वह दूसरा लाभ था। यहाँ यह भी कहना प्रासंगिक होगा कि जैसे काव्य-कला सिखानेवाला बचपन में कोई नहीं मिला था, वैसे ही भाषण कला का मार्ग प्रदर्शन करानेवाला भी कोई नहीं मिला। इतना ही नहीं, इन दोनों में सहानुभूति से प्रोत्साहन देनेवाला भी कोई नहीं मिला। इसके विपरीत मेरे समवयस्कों ने अपने अरसिक अज्ञान के कारण और समकालीन प्रौढ़ों ने मत्सर भावना से मेरा मनोभंग तथा तेजोभंग करते रहने का ही प्रयास किया। परंतु इस संघर्ष से सुप्त अग्नि की चिनगारियाँ अधिक तेजी से उड़ने लगीं। किशोर वय के बाद भी भाषण कला की अभिरुचि के कारण मैं डिमास्थेनीस, सिसरो, शेरिडन आदि अंग्रेजी मराठी चरित्रों का और लेखों का अध्ययन करता रहा। कई उद्धरण निकालकर कंठस्थ किए। मैकाले द्वारा लिखित अंग्रेजों के इतिहास की कई व्याख्यान- उपयोगी कंडिकाएँ मैंने बड़े चाव से कंठस्थ की थीं। महाभारत के श्रीकृष्ण के सभापर्व और कर्णपर्व में दिए अमोघ ओजस्वी भाषण मैंने गद्य और पद्य दोनों में बार-बार पढ़े। मैं स्वयं को ही वे सब सुनाता। मुझे वे बहुत प्रिय थे। उन संभाषणों का हर गुण-उसमें वर्णित कोटिक्रम, तर्क वितर्क, वह अधिकार, वह भाषा, वह तेज, वह प्रभाव, वह प्रकाश मुझे प्रभावित करता निस्संदेह श्रीकृष्ण जैसा वाङ्मयी तो केवल श्रीकृष्ण ही था। ”

– वीर सावरकर

संदर्भ – सावरकर समग्र भाग १ ( १६७ – १६९ )

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