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वज्रसूची

वज्रसूची

‘फलान्यथौदुंबरवृक्षजातेः मूलाग्रमध्यानि भवानि वापि।
वर्णाकृतिः स्पर्शरसैस्समानि तथैकतो जातिरिति चिंत्या ॥१॥
तस्मान् गोऽश्ववत्कश्चित् जातिभेदोऽस्ति देहिनाम् ।
कार्यभेदनिमित्तेन संकेतः कृत्रिमः कृतः ॥ २ ॥’
(भविष्य पुराण, अ. ४०)
बौद्ध धर्म के जो महान् प्रचारक हुए उनमें अवश्घोष की योग्यता बड़ी मानी गई। उनका लिखा संस्कृत श्लोकबद्ध ‘बुद्धचरित्र’ काव्य वाङ्मय के क्षेत्र में उत्कृष्ट, पूज्य एवं प्रासादिक ग्रंथ माना जाना है। उसकी गणना संस्कृत वाङ्मय की काव्य संपत्ति के एक माननीय ग्रंथ के रूप में की जाती है।
इस विद्वान् बौद्ध प्रचारक ने ‘वज्रसूची’ नामक एक अन्य ग्रंथ की भी रचना की है, जिसका विषय जन्मजात जातिभेद है। बौद्ध धर्म की उत्पत्ति के बाद हिंदू राष्ट्र में वैदिक और बौद्ध ऐसे दो धर्मपंथों के बीच जन्मजात जातिभेद के तीव्र मतभेद का जो प्रश्न बन गया था, उसपर अश्वघोष ने अपने ग्रंथ में जातिभेद प्रथा पर तर्कमूलक चर्चा की है।
उपनिषद् काल से ही वन-उपवनों में स्थित आश्रमों में स्वतंत्र तत्त्व चिंतन का भारतीय वातावरण हमेशा निनाद करता रहा। उसमें श्रुति स्मृति द्वारा रेखित मंत्ररेखा की मर्यादा की भी चिंता न करते हुए बुद्धकाल में बुद्धिवाद स्वतंत्र अकुंठित संचार करने लगा, फिर तो राष्ट्र और मानव चिंतन के हर क्षेत्र में यह ऐसा क्यों, इस प्रश्न की अग्निपरीक्षा में उस काल के सारे मत, रूढ़ियाँ, आचार-विचार साधक-बाधक चर्चा की ज्वाला में कुंदन की तरह दमकने लगे। वैदिकों ने बौद्धों के और बौद्धों ने वैदिकों के हर वचन, मंत्र, कोटिक्रम, कुशाग्र तर्कों की धुनकी से धुनक धुनक तार-तार अलग कर दिया। वैदिक-वैदिक से जब चर्चा करता या बौद्ध-बौद्ध से वाद-विवाद करता जब उनकी तर्कशुद्धता को हमेशा ‘इतिश्रुति’ या ‘इतिबुद्धानुशासन’ की अनुलंघ्य मंत्ररेखा की बाधा आगे बढ़ने से रोकती। क्योंकि श्रुतिवाक्य झूठ है, यह कहना वैदिकों के लिए असंभव है, वैसे ही ‘बुद्धवाक्य’ झूठ है यह कहना बौद्धों के लिए सर्वथा निषिद्ध। इस कारण श्रुति की परख, परीक्षा वैदिक तर्क के लिए मना, बौद्धगम की परख, परीक्षा बौद्ध तर्कशक्ति को मना ।
पर वैदिक और बौद्धों के बीच जब उपनिषद् काल से प्रचलित चले आए ‘तद्विद् संवाद’ पर चर्चा होने लगी तब श्रुति आदि सब अनुल्लंघनीय एवं अशंकनीय मर्यादाएँ भी तर्क की गति को रोक नहीं सकीं। क्योंकि बौद्धों को इतिश्रुति का डर नहीं होता था, वे तो हर मंत्र को तर्क की भट्ठी में और हेतुवाद की चंदन शिला पर घिस, परख लेने के बाद भी टिका तो लेते थे। वैदिकों के लिए ‘ इति बुद्धानुशासनम्’ की कोई चिंता न रहती। वे बुद्ध के हर शब्द को तर्क की मार के नीचे लाते थे। ऐसी स्थिति में बुद्धकाल में श्रुति स्मृति, अगम-निगम, रीति- रूढ़ि, आचार-विचार इन सब छन्नों में से छनकर पुरुष बुद्धि अग्निपरीक्षा से गुजरने को बाध्य हुई। श्रुतियों को भी पुरुष बुद्धि की परीक्षा में बैठकर ही जो प्रमाण-पत्र मिल सकता था वह प्राप्त करना आवश्यक हो गया। ऐसी ऊहापोह इतनी बड़ी मात्रा में आज तक नहीं हुई थी।
इसी कारण बुद्धकाल के धर्म-अधर्म, कर्म-अकर्म, आचार-अनाचार इन सबकी परख करनेवाली निर्मेल एवं स्वतंत्र तर्क की कसौटी पर कसी गई चर्चाएँ आज बड़ी मनोरंजक एवं बोधप्रद लगती हैं। कुशाग्र बुद्धिवाद के उस समय के मान से अप्रतिम एवं अकुंठित उदाहरण आज भी पठनीय और विचारणीय लगते हैं। ग्रंथ का उल्लेख कर उसमें ऐसा लिखा है-इसलिए वह सत्य है, ऐसा कह तर्क का मुँह बंद करने की परिपाटी सहसा नहीं दिखती। युक्तिसंगत, हेतुगम्य, बुद्धिनिष्ठ ऐसे उस काल के जो उदाहरण आज भी उपलब्ध हैं, उन्हीं में जन्मजात जातिभेद की रूक्ष और खड़ी भाषा में साधक-बाधक चर्चा करनेवाले श्रीमत् अश्वघोष रचित ‘वज्रसूची’ नामक निबंध को गिना जाना चाहिए। उसमें आज की तर्क पद्धति का सर्वत्र अवलंबन न होते हुए भी उस समय के चातुर्वर्ण्य विषय पर जो कुछ अनुकूल, प्रतिकूल, आक्षेप-प्रत्याक्षेप चलते थे उनका विचार आज भी अध्ययनीय लगे, इतने बुद्धिवाद से किया गया है। आज के जन्मजात जाति निर्मूलन के वाद में आधार प्राप्त करने के लिए नहीं अपितु इस विषय पर उस काल में इस राष्ट्र के नेतृत्व के क्या मत-विमत थे, उसे समझ लेने के लिए उपयुक्त और अपरिहार्य एक प्राचीन अधिकृत लेख मानकर उसे यहाँ उद्धृत कर रहे हैं।

श्रीमत् अश्वघोषकृत ‘वज्रसूची’

जगतगुरु श्रीमंजुघोष की अनेक वंदना कर और उनका स्मरण कर उनका शिष्य मैं अश्वघोष ‘वज्रसूची’ नामक ग्रंथ शास्त्राधारपूर्वक प्रारंभ कर रहा हूँ। धर्म और अर्थ की विवेचना करनेवाली श्रुति और स्मृति के मत-मतांतरवाले भाग को यद्यपि मैं प्रमाण नहीं मानता तथापि उसमें वर्णित विश्वसनीय एवं संयुक्तिक भाग को प्रमाण मानने में मुझे कोई आपत्ति नहीं।
परंतु श्रुति स्मृति को इस तरह प्रमाण मानते हुए भी मुझे लगता है कि चातुर्वर्ण्य विषयक उसकी कल्पनाएँ उस ग्रंथ के आधार पर सिद्ध नहीं की जा सकर्ती ।
पहले ब्राह्मण की विवेचना करें। आप ब्राह्मण किसे कहते हैं? जीव, जाति, जन्म, आचार, वेदज्ञान, ज्ञान? ब्राह्मणत्व किससे आता है? इनमें से किसे ब्राह्मण कहेंगे ?
जीव को ही आप ब्राह्मण कहेंगे तो वेदों में वैसा मानने का कोई आधार नहीं है। जीव की एक स्वतंत्र जाति ही ब्राह्मण है। कुछ भी हो, वह ब्राह्मण की ब्राह्मण ही रहेगी। ऐसे मत का वेद बिलकुल समर्थन नहीं करते। प्रत्यक्ष देवों के लिए जब वेद कहते हैं, ‘सूर्य: पशुरासीत सोमः पशुरासीत। इन्द्रः पशुरासीत पशवो देवाः ॥’ देवता भी प्रथम पशु ही थे, तदनंतर कर्मबल से देव हुए, तो ब्राह्मण का जीव मूलतः ब्राह्मण है और वह ब्राह्मण अपरिवर्तित ब्राह्मण ही रहेगा-यह कैसे सिद्ध होगा? अधिक क्या कहें, नीच से नीच जो हैं श्वपाक वे भी ब्राह्मण तो क्या देव भी हो सकते हैं, हुए हैं—’आद्यत्ते देवा पशवः श्वपाका अपि देवा भवन्ति’ ऐसा श्रुति ही कहती है। वैसा ही अनुवाद ‘महाभारत’ ने किया है। ‘महाभारत’ में तो एक जगह स्पष्ट लिखा है कि कालिंजल पहाड़ी के सात शिकारी, दस मृग, मानस सरोवर का एक बतख, शरद् द्वीप का एक चक्रवाक- ये सब कुरुक्षेत्र में ब्राह्मण के रूप में जनमे और वेद पढ़ उसमें पारंगत हुए। मनु कहता है, चतुर्वेद और उसके अंग उपांग में प्रवीण ब्राह्मण यदि शूद्र से दक्षिणा या दान स्वीकार करेगा तो उसे गधे के बारह जन्म, सूअर के छह जन्म और सत्तर जन्म कुत्ते के होंगे। इससे यह स्पष्ट है कि ब्राह्मण का यह जीव ब्राह्मण स्वरूप है और वह कभी भी अब्राह्मण नहीं हो सकता। यह कल्पना श्रुति स्मृति को स्वीकार नहीं है।
अब आप यह कहें कि ब्राह्मणत्व माँ-बाप से अर्थात् रक्तबीज से प्राप्त होता है, ब्राह्मण माँ-बाप के पेट से जिसका जन्म होता है वह और वही ब्राह्मण है तो वह कल्पना भी शास्त्र-विरुद्ध है। स्मृति के हर श्लोक से यह स्पष्ट है। अचल मुनि का जन्म हाथी के पेट से, केशपिंगला का उल्लू के पेट से, कौशिक का घास के पेट से, द्रोणाचार्य का मटके से, तैत्तरी ऋषि का पक्षी के पेट से, व्यास का मत्स्यकन्या से, कौशिकी का शूद्रिणी से, विश्वामित्र का चांडाल से, वशिष्ठ का वैश्या से – ये सारे उदाहरण स्मृति से दिए जाने से आपको मान्य करने ही होंगे। इन सबके माँ-बाप ब्राह्मण न होते हुए भी उन्हें आप ब्राह्मणत्व के अधिकारी मानते हैं। अतः माँ-बाप के द्वारा ही ब्राह्मणत्व मिलता है, ब्राह्मण माँ-बाप के पेट से जन्म ले वही ब्राह्मण हो सकता है- यह कहना असत्य हो जाता है।
स्मृति के श्लोकों की बात भी छोड़ दें और प्रत्यक्ष व्यवहार में घटित जो कुछ सुनने में आता है तथा देखा जाता है उसका विचार निस्संकोच करें। अनेक उदाहरण देखने में आते हैं, जिनमें शूद्र पुरुष से ब्राह्मण स्त्री का गुप्त संबंध हो जाता है और वह संतति ब्राह्मण कुल में ही समाई रहती है। माँ-बाप में से एक या दोनों के ही ब्राह्मण न होते हुए भी मनुष्य को ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाने के प्राचीन (स्मृति में उद्धृत) एवं अर्वाचीन उदाहरणों के आधार पर यह कहना कि ब्राह्मणत्व माँ बाप से ही मिलता है, झूठ है। ब्राह्मण माँ-बाप के उदर से जन्म लेने से प्राप्त ब्राह्मणत्व की पैतृक उत्पत्ति को सच मानें तो एक बार प्राप्त ब्राह्मणत्व मरने तक समाप्त नहीं होना चाहिए। ब्राह्मण पितरों के उदर से जो मिले वह तो आजीवन रहेगा ही, क्योंकि उसके प्राप्त होने की जो प्रथम शर्त है वह जनमते ही पूर्ण हो चुकी है। पर हमारी स्मृतियों को पढ़ें तो कुछ अलग ही दृश्य दिखता है। मनु कहते हैं, जो ब्राह्मण मांस भक्षण करेगा वह तत्काल ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाएगा। जो ब्राह्मण मोम, दूध, नमक बेचेगा वह तीन दिन में शूद्र हो जाएगा। अर्थात् ब्राह्मण माँ-बाप के उदर से जन्म लेना ही एकमेव ब्राह्मणत्व का कारण नहीं है या ब्राह्मणत्व प्राप्त करने का उपाय नहीं है। जन्म से निश्चित होनेवाला ब्राह्मणत्व नीच कर्म से अकस्मात् नष्ट कैसे हो जाएगा ? आकाश में उड़नेवाले घोड़े के भूमि पर उतरते ही सूअर बन जाने की कथा क्या किसी ने सुनी है या उसपर विश्वास किया है ?
ब्राह्मणत्व शरीर का धर्म है, किसी एक विशिष्ट शरीर में ब्राह्मणत्व आवेशित है-ऐसा कहेंगे तो बड़ा घोटाला हो जाएगा। ब्राह्मण का शरीर प्रेत होते ही जो उसे चिता पर रख अग्नि देगा, उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा। वध किए जाने पर दंड का भागी होगा। क्योंकि ब्राह्मणत्व यदि शरीर में होगा तो जो शरीर जलाएगा वह ब्रह्म हत्या करेगा। जिन श्लोकों में ऐसा लिखा हुआ होता है कि यजनयाजन, अध्ययन-अध्यापन, दान, प्रतिग्रह ये सारे कार्य ब्राह्मण की देह से निर्मित होते हैं
ऐसे मतवादियों से हम यह प्रश्न करते हैं कि ब्राह्मण का शरीर नाश होते ही उन सारे कर्मों के गुणधर्मों का नाश हो जाता है क्या? उनका उत्तर होगा ‘कभी नहीं’। तो इसका अर्थ होगा ब्राह्मण का शरीर माने ब्राह्मणत्व नहीं। इतना ही नहीं, वह ब्रह्म कर्म का उत्पत्ति स्थान भी नहीं है।
अब ज्ञान से ब्राह्मण होता है ऐसा कहें तो ठीक, पर व्यवहार में लाया जाए तब । उपर्युक्त व्याख्या के अनुसार जो भी ज्ञानी है उसे ब्राह्मण के सारे अधिकार दिए जाने चाहिए। ज्ञान से ब्राह्मणत्व प्राप्त होता हो तो अनेक शूद्रों को ब्राह्मण मानना पड़ेगा। चतुर्वेद, व्युत्पत्ति मीमांसा, सांख्य, वैशेषिक, ज्योतिष, तत्त्व ज्ञान आदि में पारंगत पंडित शूद्रों में आज भी हैं और मेरे परिचित हैं; परंतु उनमें से किसी को भी ब्राह्मण मानकर उन्हें ब्राह्मणत्व के अधिकार सौंपे नहीं गए हैं। अतः आप जिसे ब्राह्मणत्व कहते हैं वह केवल ज्ञान से प्राप्त होता है, ऐसा आप कैसे कह सकते हैं?
आचरण से ब्राह्मण निश्चित होता है ऐसा कहेंगे, परंतु व्यवहार में आप अपनी इस व्याख्या के अनुसार रत्ती भर भी चलते नहीं हैं। भाट, कैवर्तक और भांड आदि के आचार कितने सात्त्विक होते हैं देखें, अनेक कष्ट सहन कर वे कड़ाई से धर्माचार का पालन करते हैं। साधारण ब्राह्मण से उनके आचार इतने सात्त्विक होने पर भी आप उन्हें गलती से भी ब्राह्मण नहीं कहते।
ज्ञान के अन्य विभाग में कोई कितना ही पारंगत क्यों न हो, उसे ब्राह्मणत्व नहीं मिलता। ब्राह्मणत्व तो वेदपठन एवं वेदज्ञान प्राप्त करके ही संपादित किया जा सकता है, ऐसा कहेंगे; पर हम पूछते हैं कि रावण वेद में पारंगत था पर उसे राक्षस कहा जाता था, ब्राह्मण नहीं। उस युग के राक्षस वेदपठन करते थे फिर आप उन्हें ब्राह्मण क्यों नहीं कहते ?
सारांश यह है कि आप किस गुण के कारण या किस धर्म के कारण ब्राह्मणत्व निश्चित करते हैं, यह आप समझते नहीं हैं। ब्राह्मण किसे कहा जाए? इसका आप विचार ही नहीं करते। कोई एक कसौटी निश्चित करें और उस कसौटी पर जो खरा उतरे वही ब्राह्मण हो, ऐसा आपका आचरण नहीं है।
मेरे विचार से ब्राह्मण का लक्षण यह है कि वह एक निष्कलंक गुण जिसके कारण पाप घटता है वह ब्राह्मणत्व! व्रततप, दान, शमदम संयम आदि से है। सुसंपन्न मनुष्य एवं अविवेक, अहंकार, राग व द्वेष से मुक्त, संग व परिग्रह के लिए अशक्त, दया जिसका ध्येय, वह ब्राह्मण! इन सद्गुणों के विरुद्ध जो दुर्गुणी व दुष्ट वह चांडाल। वेदों और शास्त्र में ब्राह्मणत्व का यही सामान्य लक्षण है। शुक्राचार्य तो इससे भी आगे जाकर कहते हैं कि देवों को जाति की परवाह नहीं होती, अधमाधम गिनी जानेवाली जाति में जनमे सज्जन व्यक्ति को वे ब्राह्मण कहते हैं।
सज्जन शूद्र को भी संन्यास का अधिकार नहीं, उन्हें तो द्विजों की सेवा ही करनी होगी; क्योंकि शूद्र तो नीच है। आपके ऐसे विधान का आधार क्या है? तो कहा जाता है कि चातुर्वर्ण्य की गिनती में ‘शूद्र’ शब्द अंत में आता है, इसलिए वह नीच है ऐसा कहना बचपने का चरम प्रदर्शित करने जैसा है। इतना भी आपको कैसे ध्यान में नहीं आता, समझ के बाहर है। बोलते या लिखते समय जो शब्द प्रवाह में आगे-पीछे लिखे-कहे जाते हैं वे उच्च या नीच का प्रदर्शन करने के लिए नहीं होते। उच्चारण में सहज गति आने के लिए या व्याकरण की दृष्टि से आगे-पीछे रखे जाते हैं। ऐसे शब्दक्रम का अर्थ यदि हमेशा ऊँच-नीच के अर्थ में लिया तो क्या-क्या हास्यास्पद स्थिति बन सकती है, देखें —
पाणिनि का एक प्रसिद्ध सूत्र है- ‘श्वानं युवानं मधवानमाह ।’ अब इसमें है श्वान पहले आया है तो क्या कुत्ता इंद्र (मधवान) से श्रेष्ठ और इंद्र कुत्ते से नीच समझा जाए। दन्तौष्ठ समास में ‘दंत’ पहले आया है इसलिए दाँत होंठों से श्रेष्ठ होगा क्या? वास्तव में होंठ ज्येष्ठ, दाँतों का जन्म तो बाद का। ‘उमामहेश’ कहा जाता है तो क्या उमा को महेश से श्रेष्ठ मानें। वैसे ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कहने से शूद्र नीच? कितना ही सज्जन हो, पर यदि वह शूद्र है तो वह दुर्जन है ऐसा कहना बचपना ही तो होगा। शूद्र को इसीलिए संन्यास का अधिकार भी है।
मनु ने अपने ग्रंथ में, शूद्र नीच होते हैं–ऐसा कहा है, ऐसा आप कहते हैं– शूद्र स्त्री का स्तनपान जिसने किया है या जिसपर शूद्रिणी ने फूँक मारी है या जिसकी माँ ही शूद्र हो ऐसे ब्राह्मण कुल को ब्राह्मण जाति में प्रायश्चित्त लेकर भी प्रवेश मना है। जो शूद्र स्त्री से अन्न-पानी लेता है वह ब्राह्मण इसी जन्म में शूद्र एवं अगले जन्म में कुत्ता होगा। शूद्र स्त्री को ‘राखना’ भी नहीं चाहिए। ऐसा करनेवाला ब्राह्मण मरने पर नरक में जाता है। ऐसी सारी व्यवस्थाएँ मनु के ग्रंथ में हैं, यह सच है। परंतु उसे सच मानें तो ब्राह्मण जन्म से ब्राह्मण है और वह कुछ भी करे ब्राह्मण का शूद्र नहीं होता, यह आपका मुख्य सिद्धांत ही असत्य है। शूद्र सदाचारी हो तो ब्राह्मण हो जाता है और दुराचारी हो तो ब्राह्मण ही शूद्र हो जाता है-यह हमारा सूत्र ही सत्य है। मनु ने अपने ग्रंथ में यह भी स्पष्ट किया है कि शूद्रों ने अपने पुण्यशील आचरण से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया है। काठीन मुनि और उर्वशी का पुत्र वशिष्ठ, कुलाल स्त्री का पुत्र नारद-ये जन्मतः शूद्र होते हुए भी तप और सदाचार से ब्राह्मण हुए। नीच कुल में जन्म लेकर पुण्य के बल पर स्वर्ग तक पहुँचे, ऐसे लोगों के चाहे जितने उदाहरण मिलते हैं, उन्हें क्या आप नकार देंगे ?
ब्राह्मण के लिए जो मैंने कहा वही क्षत्रिय के लिए भी वैसा-का-वैसा ही लागू है। बड़े राजा का वंश होते हुए भी सद्गुणों का अभाव हो वह क्षत्रिय भी तिरस्कार के योग्य है—ऐसा मनु कहता है। चार जाति-वर्ण की कल्पना ही असत्य है। मनुष्य की जाति केवल एक है।
तुम्हीं कहते हो ब्रह्मदेव ने सारी मनुष्य जाति उत्पन्न की, फिर उनमें एक दूसरे से रक्तबीज संबंधविहीन चार जातियाँ कैसे निर्मित हुई ? मुझसे मेरी पत्नी को चार बालक हुए वे सब एक ही जाति के तो होंगे! फिर एक ब्रह्मदेव की चार संतानें जाति से अलग-अलग कैसे होंगी ?

जाति की भिन्नता वास्तव में कैसी होनी चाहिए?

यदि जाति अलग माननी हो तो भेद कैसा होना चाहिए, यह निश्चित करने के लिए प्राणियों की जातियाँ कैसे निश्चित होती हैं-वही देखना चाहिए। इंद्रियादि रचना के मूल भेद से ही जाति की विलगता निश्चित होती है। घोड़े का पैर हाथी के पैर जैसा नहीं होता। शेर की टँगड़ी और मृग की टँगड़ी एक जैसी नहीं होती। इस तरह के शरीर और इंद्रियों के रचनात्मक मूल भेद के आधार पर ही एक जाति दूसरी से अलग है, यह निश्चित किया जाता है। पर उसी अर्थ और आधार पर ब्राह्मण और क्षत्रिय की दो जातियाँ कभी भी नहीं मानी जा सकतीं। उनके पैर उस तरह से अलग-अलग नहीं होते। बैल, साँड़, घोड़ा, हाथी, गधा, बंदर, बकरा आदि के जनन अंग, रंग, आकार, ध्वनि, मल-मूत्र तक में इतना मौलिक अंतर होता है कि उनमें प्रत्येक को भिन्न जाति के रूप में सरलता से पहचाना जाता है। मनुष्य में उसी आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय भिन्न जातियों के हैं ऐसा क्या कभी कहा जा सकता है? जैसे पशुओं में वैसी ही स्थिति पंछियों में कबूतर, तोता, कौआ, मोर आदि के ध्वनि, रंग, पंख, जितने मूल रूप में भिन्न होते हैं उतना और वैसा भिन्नत्व क्या कभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों में होना कभी संभव है? वृक्षों में बड़, पीपल, बबूल, अशोक, ताड़, चंपा आदि के तने, पत्ते, फूल, फल, छिलके, बीज सबकुछ अलग, उनकी जाति अलग। परंतु इसी अर्थ में जाति शब्द से ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि में विभेद करना संभव ही नहीं, इतने ये चारों वर्णों के लोग अंतर्बाह्य एक-जाति हैं। हड्डी, रक्त, मांस, अवयव आदि लक्षण अभिन्न हैं। हास्य-रोदन, भाव-भावना, रोग-भोग, जीने-मरने की रीतिकृति, डर के कारण, कर्मों की प्रवृत्ति आदि इतने एक जैसे हैं कि घोड़ा और बैल में जितनी सहजता से जातिदर्शक भिन्नत्व दिखता है वैसा भिन्नत्व चार वर्णों के बीच कभी दिख नहीं सकता, इसीलिए उनके साथ भिन्न जाति का विशेषण लगाया ही नहीं जा सकता और उस अर्थ में उन्हें एक जाति ही समझना अनिवार्य है।
गूलर और बड़ के पेड़ों में डाली तना, टहनी, जड़ सब स्थानों पर फल लगते हैं, लेकिन डाली पर लगा फल तने या जड़ पर लगे फल से रंगाकृति, स्पर्श, रस में बिलकुल समान होता है और इसीलिए वे फल एक ही हैं—ऐसा हम समझते हैं। अलग जाति के नहीं मानते। टहनी के सिरे पर लगे गूलर को ब्राह्मण गूलर कहें क्या? उसी तरह आप कहते हैं कि ब्रह्मदेव के शरीर के अलग-अलग भाग से ब्राह्मण, शूद्रादि उत्पन्न हुए, ऐसा मान भी लें तो भी उन्हें भिन्न जातीय कैसे माना जा सकता है ? वे अलग-अलग जातियों के कैसे होंगे ?

वैशंपायन-धर्मराज संवाद

महाभारत में वैशंपायन और धर्मराज के बीच हुई एक चर्चा इसी संदर्भ पर अच्छा प्रकाश डालती है, उसे देखें। धर्मराज ने प्रश्न किया-“हे वैशंपायन ऋषि! आप ब्राह्मण किसे कहते हैं और ब्राह्मण के लक्षण क्या हैं?” इस प्रश्न के उत्तर में वैशंपायन अंत में कहते हैं-“युधिष्ठिरजी, सत्य, दया, इंद्रिय दमन, परोपकार एवं तपाचरण ये गुण जिसमें हैं उसे मैं ब्राह्मण समझता हूँ, जिसमें इन गुणों का अभाव है उन्हें शूद्र। ये पाँच गुण माने ब्राह्मणत्व। यदि ये गुण किसी चांडाल में हों तो वह भी ब्राह्मण ही है। पहले भूलोक पर एक ही जाति थी, फिर आचार, कर्मादि भिन्नत्व बढ़ने से चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था स्थापित हुई। ‘एकवर्णमिदं पूर्वं विश्वमासीत् युधिष्ठिर । कर्मक्रियाप्रभेदेन चातुर्वण्यं प्रतिष्ठितम् ॥’ सब मानवों की उत्पत्ति स्त्री से एक ही पद्धति से होती है, सबकी दैहिक आवश्यकता, अंतरइंद्रिय एक जैसी होती हैं अर्थात् जाति अलग न होकर जिसका आचरण अच्छा वह ब्राह्मण, बुरा वह शूद्र अर्थात् आचरण सुधारते ही वह शूद्र तत्काल ब्राह्मणत्व का अधिकारी हो जाता है। हे राजा! इसलिए इंद्रिय मोह से अलिप्त और सद्शील शूद्र को दान देना सत्कृत्य हो है और स्वर्ग प्राप्ति करानेवाला भी। जाति का विचार असत्य, सद्गुणों पर ही ब्राह्मणत्व अधिष्ठित है। जो दूसरे के कल्याण के लिए दिन-रात लगा रहता है वह ब्राह्मण, जो जीवन सद्कृत्यों में खपाता है वह ब्राह्मण, क्षमा, दया, सत्य, शौच, ज्ञान विज्ञान से जो युक्त वह ब्राह्मण।”
‘महाभारत’ ग्रंथ में वैशंपायन ऋषि ऐसा कहते हैं। मित्र, आप भी इसे समझें, उस सत्मार्ग पर चलें।
अज्ञान दूर हो इसलिए मैं, अश्वघोष ने यह प्रवचन किया। पट गया आपको तो ठीक, किसी ने उसे जान-बूझकर टाल दिया तो भी मैं उसका बुरा न मानूँगा। इति वज्रसूची ।
उपर्युक्त प्रवचन द्वारा अश्वघोष ने प्राचीन काल में प्रचलित आक्षेपों आदि का निराकरण उस काल की तर्क पद्धति के अनुसार किया है अर्थात् उस प्राचीन लेख को तत्कालीन मानकों पर ही देखा जाना चाहिए, यह कहने की आवश्यकता “नहीं। उपर्युक्त लेख में जन्मजात चातुर्वर्णीय जातिभेद के विरुद्ध जो-जो तर्क प्रस्तुत किए गए हैं उन्हें आज की परिस्थिति में पढ़ते समय उनमें जो कमियाँ है उस ओर भी दुर्लक्ष नहीं होना चाहिए। उसमें एक कमी ऐसी है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। वह यह कि उसमें ब्राह्मण जाति ही सारी ऊहापोह का केंद्र है। परंतु वास्तव में ब्राह्मणों को दिए हुए उत्तर क्षत्रियों से निम्न वर्णों को पैरों तले कुचलनेवाले क्षत्रियों पर भी यथावत् लागू होते हैं। वैश्यों में भी ऊपर के ब्राह्मण-क्षत्रियों को पीड़क वर्णाहंकारी आदि गाली देनेवाले हैं तो शूद्र, अस्पृश्य आदि निम्न वर्णों को अपनी उच्च बनियायी का पानी दिखाकर नीच वर्ण के ब्राह्मण बननेवाले लाखों वैश्य भी हैं। शूद्रों में भी ‘त्रैवर्णिकोने’ जातिभेद का ढोंग फैलाकर हमें नंगा किया, कहनेवाले शूद्र भी उनसे निम्न शूद्र उपजातियों को उसी जातिभेद के उसी ढोंग से हीन दरशाने से नहीं चूकते।
मंदिर प्रवेश के लिए महाराष्ट्र में शूद्रों द्वारा किए गए सत्याग्रह में सत्याग्रहियों के सिर पर लाठी मारनेवालों में अनेक ‘मराठे’ भी थे। नासिक के राममंदिर सत्याग्रह में अस्पृश्यों को मंदिर में प्रवेश न करने देनेवाले महा कट्टर विरोधी लोगों में में केवल पंडित नहीं थे अपितु सेठजी और रावजी भी थे। अस्पृश्य घोड़े पर न बैठे, यह अधिकार केवल क्षत्रियों का है, ऐसा अहंकार दरशानेवाले अनेक क्षत्रिय राजाओं ने अस्पृश्यों को कठोर दंड दिए हैं। राजपूताने में गत दो वर्षों में कई-कई बार मारपीट किए जाने की घटनाएँ हुई हैं। एक शिक्षित मराठा कन्या द्वारा उच्च वर्णीय कुल में प्रेमविवाह करने की ठानने पर जातिगंगा भरकर उसके विरुद्ध मारपीट की धमकी देने तक बात बढ़ी और हिंदूसभा में उसकी शिकायत की गई। ‘पांडव प्रताप’ नामक ग्रंथ का उत्सव कर शोभायात्रा निकालनेवाले महारों पर शूद्रों के लाठी चलाने की घटना तो अभी ताजा ही है। गाँव खेड़े की पाठशालाओं में हमारे बच्चे के पास चमार, भंगी के बच्चे को नहीं बैठने दिया जाना या मारपीट तो बहुत ही सामान्य सी बात है। द्विजों के साथ एकासन करनेवाले शूद्र को दंडनीय कहनेवाले स्मृतिग्रंथों को गंदी गालियाँ देनेवाले शूद्र स्वयं के साथ अस्पृश्यों को एकासन करने नहीं देते। अधिक क्या कहें, अस्पृश्यों में भी निम्न जाति पर वही अन्याय उसी उच्च जातिमत के सूत्र से वे करते हैं, जो अन्याय ब्राह्मणों ने उनपर किए, इसलिए ब्राह्मणों से निम्न ब्राह्मणों को और अस्पृश्य स्पृश्यों को गालियाँ देते आए हैं। इस तरह सीढ़ी का हर ऊँचा डंडा अपने से नीचे डंडे को डंडा दिखाकर अपना उच्चत्व सिद्ध करता है।
नासिक में राममंदिर में घुसेंगे-ऐसा कहते ही ब्राह्मण, वैश्य, मराठों ने महारों की पिटाई की और उस असमानता के लिए सात्त्विक एवं न्याय्य गुस्से से लाल महारों के मंदिर में यदि भंगी वैसा ही सत्याग्रह कर घुसने लगें तो वे ही महार उसी असमानता के झंडे की रक्षा करने के लिए भंगियों को पीटने से बाज नहीं आएँगे। रायगढ़ किले पर गत माह शिवाजी उत्सव के अवसर पर महार सहभोजन के लिए आए, इसलिए कुछ मराठा और ब्राह्मण उठकर चले गए। वैसे ही महारों की सार्वजनिक पंगत में भंगी लोगों के घुसते ही महार भी उनका प्रतिकार करने से चूकते नहीं ।
इस तरह जातिभेद के पागलपन का दोष ब्राह्मण, क्षत्रिय या स्पृश्यों पर डालना केवल पक्षपात है। इस रोग से भंगियों तक हर जाति ग्रसित है। जाति अहंकार का रोग सबमें है। उसकी जो भी गालियाँ कोई ब्राह्मण या क्षत्रियों को देना चाहता है वह गालियाँ वास्तव में समान रूप से भंगियों तक हर जाति में बाँट देनी चाहिए।
मजे की बात यह कि इस जन्मजात जातिभेद के रोग को नष्ट करनेवाले सुधारकों में प्रमुख सुधारक ब्राह्मण ही थे; बुद्ध ने अपने बाद अपने संघ का पूरा बोझा एवं संचालकत्व का अधिकार एक ब्राह्मण को सौंपा था। वैसे ही मरने के पूर्व ‘पीठाधिष्ठानवसन’ के स्वयं को प्राप्त अधिकार अपने जिस पट्ट शिष्य को सौंपे वह महाकाश्यप एक ब्राह्मण था। बौद्ध पंथ के बड़े-बड़े ग्रंथकार, सूत्रकार, प्रचारक, भिक्षु भी ब्राह्मण ही थे। वैष्णव संतों में अनेक प्रमुख आचार्य चैतन्य प्रभु, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस सारे ब्राह्मण थे। आर्य समाज के संस्थापक दयानंद, ब्रह्म समाज के अध्वर्यु टैगोर, प्रार्थना समाज के रानडे ब्राह्मण थे। उसी तरह अनेक क्षत्रिय, अनेक वैश्य, अनेक शूद्र जैसे रोहिदास, चोखा, नंद तिरुपेल्लुयर जैसे अनेक अस्पृश्य भी महान् सुधारक हो गए हैं और हो रहे हैं।
अर्थात् ब्राह्मणों में, भंगियों में जाति अहंकारी, विषमतावादी, पीड़क जैसे मिलते हैं वैसे ही उसी अनुपात में जातिभेद नष्ट करने के इच्छुक समतावादी, सुधारक भी मिलते हैं। ब्राह्मण या क्षत्रिय ही लुच्चे और अन्य सब बड़े परोपकारी, साधु, समतावादी, सज्जन ऐसा कहनेवाला जातिभेद नष्ट करने का इच्छुक व्यक्ति जातिद्वेष का ही कार्य करता है, जाने-अनजाने जातिभेद ही सत्य है यह सिद्ध करता है। क्योंकि ब्राह्मण या अन्य कोई भी जाति जन्मतः और पूरी जाति ही खराब एवं अन्य जाति पूरी और जन्मतः ही पक्की तरह अच्छी, ऐसा कहें तो जातियाँ केवल मानी हुई, केवल पोथीजात न होकर वास्तविक जन्मजाति हैं, उनमें जन्मजात ऐसा कोई विशिष्ट विभेद है यही सिद्ध होता है।
ब्राह्मणों की या भंगियों की जाति में सब ही बुरे या सब ही अच्छे जन्मतः ही विभाजित नहीं होते। ऐसा कहनेवाले किसी पगले का वह आक्षेप मूलतः झूठा और द्वेष-दूषित होता है। सारी जातियाँ मूलतः भिन्न नहीं हैं। जातिभेद जन्मत: नहीं होता, केवल माना हुआ, पोथीजन्य है यही निश्चित होता है। अश्वघोष द्वारा लिखित ‘वज्रसूची’ में ये सारे सिद्धांत सूचित हैं, पर उचित स्पष्टीकरण के लिए हमने उपर्युक्त स्पष्टीकरण दिया है।
– विनायक दामोदर सावरकर
(किर्लोस्कर)

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