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सावरकर और भगतसिंह की याचिका में फर्क , जो ‘ The Wire ’ समझ नहीं पाया

‘ The wire ’ ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर और हुतात्मा भगतसिंह इनके आवेदनोपर एक लेख जारी किया था , जिसका उद्देश सावरकर जी की उपेक्षा करना था ।

इस लेख में ‘ the wire ‘ के लेखक बोलते है – ” Bhagat Singh and Savarkar, Two Petitions that Tell Us the Difference Between Hind and Hindutva.

The Indian revolutionary, who popularised the slogan ‘Inquilab Zindabad’, demanded that the British send a military detachment to execute him by firing squad; the Hindu nationalist promised to give up the fight for freedom if released – and kept his word. ”

” इन आवेदनो के बीच क्या भेद है ? हिंद और हिंदुत्व मै क्या भेद है ? ” ऐसा प्रश्न कर ये लोग अपने लेख मै दिखाना चाहते हैं कि – ” कैसे भगतसिंह कारागार में ब्रिटिशो को विरोध करते करते हुतात्मा होना चाहते थे और कैसे वीर सावरकर ब्रिटिशो से क्षमा मांग कर कायरता से अंदमान से निकलना चाहते थे ।”

इन्हे द्वेष का पोषण करने हेतू इतना प्रयास करना काफी था । परंतु वीर सावरकर और भगतसिंह के आवेदनो का सत्य भेद ‘ the wire ‘ को छुपाना पडा , जो वीर सावरकरजी ने पहले ही ‘ श्रद्धानंद ‘ के अपने लेख मै प्रस्तुत किया था :

सावरकर कहते है – ” ऐसी स्थिति में प्रतिज्ञा को यशाशीघ्र तोड़ना ही सच्ची शूरता है , सच्चा देशाभिमान और सच्चा धैर्य है । इसीलिए हम अपने देशबंधुओं , विशेषतः भगतसिंह आदि तेजस्वी एवं अनमोल नररत्नों से , वीरों से आह्वानपूर्वक विनती करते हैं कि राजनीतिक बंदियों के अधिकारों जैसे गौण और सापेक्षतः कम मूल्य की माँग के लिए वे राष्ट्रीय पक्षों को , धुरंधर युवकों की बलि न चढ़ाएँ । हमारा मुख्य लक्ष्य है स्वातंत्र्य प्राप्ति , उन प्राणों की बलि वे उसके लिए दें । इन चुनिंदा वीरों को चाहिए कि वे युद्ध के प्रमुख केंद्र पर , शत्रु के मर्मस्थल पर टूट पड़ें न कि विपक्ष के बाजारू लोगों से मुट्ठी भर आटे के लिए उलझे । उन्हें अपने शरीर में अनशन का शूल घुसाकर फकीर की तरह नहीं मरना चाहिए । स्वातंत्र्य युद्ध में विपक्ष से लड़ने के लिए यह सांधन सर्वथा अनुपयुक्त है । जो शस्त्र विपक्ष की हानि न करे , उलटे अपने ही पक्ष का नुकसान करे , वह शस्त्र ही नहीं है और इसलिए इसका उपयोग करनेवाला भी कुशल योद्धा नहीं माना जाएगा । ”

अर्थात वीर सावरकर छोटे कारणोसे कारागार में व्यर्थ मरने के विरोध में थे । जब वह रत्नागिरी स्थानबद्धता से छूटे तभी राजकारण में राष्ट्रकार्य हेतू आ गये । स्वतंत्रता हेतू बंदीवास में मृत्यू को प्राप्त न होकर , बाहर आकर शत्रू से लड़ने के लिए ही सावरकर भगतसिंह को सूचित करते है । इसी कारण उन्होने खुद आवेदनों का प्रयोग किया था । उसके विपरीत भगतसिंह ‘प्राण-आहुती’ देकर तरुणो और क्रांतिकारको में उदाहरण प्रस्थापित करना चाहते थे । यही मूल भेद है सावरकर जी के और भगतसिंह के आवेदनोमे , जिसका अर्थ पक्षपाती ‘ The Wire ‘ जैसे माध्यमों को जानबूझकर समाज से छुपाना पड़ता है ।

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