Home Article हिंदुत्व के आंदोलन की भूमिका तथा कुछ मूलतत्त्व

हिंदुत्व के आंदोलन की भूमिका तथा कुछ मूलतत्त्व

१. वह प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है जो इस भारतभूमि को, सिंधु से सागर तक की इस भूमि को अपनी पितृभूमि तथा पुण्यभूमि मानता है। पुण्यभूमि का अर्थ है-वह भूमि जिसमें उसका धर्म उत्पन्न हुआ तथा विकसित हुआ।

इसी कारण वैदिक, सनातनी, जैन, लिंगायत, बौद्ध तथा सिख धर्म और आर्य, ब्रह्मो, देव, प्रार्थना समाज तथा इसी प्रकार के हिंदुस्थान में उत्पन्न अन्य धर्म के अनुयायी आदि सभी हिंदू हैं। इन सभी को मिलाकर संकलित रूप से हिंदू समाज बनता है।

आदिवासी अथवा वन्य जाति के रूप में रहनेवाले सभी हिंदू ही हैं, क्योंकि वे कोई भी धर्म अथवा पूजाविधि मानते हों तब भी उनकी पितृभूमि या पुण्यभूमि हिंदुस्थान ही है।

इस कारण इसी परिभाषा को शासन द्वारा मान्यता प्रदान की जानी चाहिए तथा आगामी जनगणना के समय हिंदुओं की जनसंख्या की गिनती करते समय हिंदुत्व के बोधक के रूप में इसी परिभाषा को मान्यता प्राप्त होनी चाहिए। संस्कृत भाषा में यह परिभाषा निम्नानुसार है –

आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका ।
पितृभूः पुण्यभूश्चैव सवै हिन्दुरितिस्मृतः ॥

. हिंदू शब्द मूलतः विदेशी शब्द नहीं है अथवा हिंदुस्थान में मुसलमानों के आगमन से उसका किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है। कुछ क्षुद्र विदेशी लेखकों के धातुक प्रतिपादन के कारण कुछ समय तक भूलवश इस प्रकार सोचा जाता रहा था, परंतु हम लोगों के वैदिक ऋषियों ने भी इस भूमि को सिंधु अथवा सप्तसिंधु कहा है। उदाहरणार्थ, ‘ऋग्वेद’ की निम्न ऋचा यह कथन पूर्णतः प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है –

आऋक्षा देह सो मुचद्यो कर्यात्सदत सिन्धुषु ।
वद्यदसिस्य नुविननृभ्ण ननिमः ॥

(ऋग्वेद, ६-८)

मुसलमानी पैगंबर मुहम्मद के जन्म से सहस्रों वर्ष प्राचीन बेबिलोनियन लोग हम लोगों को सिंधु ही कहते थे तथा प्राचीन जेंदावेस्ता में सिंधु रूप में हम लोगों का उल्लेख किया गया है। सिंधु नदी के इस पार हम लोगों एक प्रांत आज भी इसी नाम से संबोधित किया जाता है। उस प्रांत को आज तक सिंधु देश कहते हैं तथा वहाँ के निवासियों को सिंधु (सिंधी) कहा जाता था। हम लोगों की अर्वाचीन भाषा संस्कृत के सं का रूपांतर कई बार ‘ह’ में हो जाता है। जिस प्रकार केसरी तथा कृष्ण हिंदी प्राकृत भाषा में केहरी तथा कान्हा में रूपांतरित हो गए। जिस किसी को इस विषय का अधिक सांगोपांग तथा परिपूर्ण विवेचन की आवश्यकता प्रतीत होती हो तो उन्हें मेरी (अंग्रेजी) पुस्तक ‘हिंदुत्व’ देखनी चाहिए।

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