Home Article स्वातंत्र्यवीर सावरकर का अंतिम इच्छा-पत्र

स्वातंत्र्यवीर सावरकर का अंतिम इच्छा-पत्र

स्वातंत्र्यवीर सावरकर का अंतिम इच्छा-पत्र

(मृत्यु -पत्र)

बंबई- २८

दिनांक १ अगस्त, १९६४
सावरकर सदन ७१ शिवाजी उद्यान मैं, विनायक दामोदर सावरकर, हिंदू, आयु ८२ वर्ष, व्यवसाय : लेखन, निवास–’सावरकर सदन’, डॉ. राऊतपथ, ७१ शिवाजी उद्यान, बंबई-२८; व्यवस्था पत्र (मृत्यु – पत्र) लिखकर रख रहा हूँ कि –

१. इस समय मेरी आयु ८१ वर्ष पूरी हो चुकी है। मेरी मानसिक अवस्था उत्तम है। फिर भी वृद्धावस्था के कारण तथा चिरकालीन व्याधि के कारण मैं वर्तमान में बिस्तर से बँधा हूँ और देह का कोई भरोसा नहीं लगता। इसलिए मेरी चल-अचल संपत्ति की व्यवस्था मेरी मृत्यु के बाद निम्न रीति से हो-ऐसी मेरी इच्छा है।

२. मेरी अचल और चल संपत्ति स्वकष्टार्जित एवं स्वउपार्जित है, अतः उसपर मेरे सिवाय किसीका भी स्वामित्व नहीं है। इस संपत्ति का चाहे जैसा विभाजन करने का मेरा अधिकार है। इस कारण निम्नलिखित व्यवस्था मैं कर रहा हूँ –

३. मेरी मुख्य अचल संपत्ति मेरा निवास स्थान ‘सावरकर सदन’, ७१ शिवाजी उद्यान ही है। मेरी इकलौती कन्या प्रभावती का विवाह हो चुका है और वह श्री माधवराव चिपळूणकर वर्तमान निवास दिल्ली को ब्याही है। उसे वर्तमान में एक पुत्र चि. प्रफुल्ल और एक कन्या कु. माधुरी नाम की दो संतानें हैं। मेरे इकलौते बेटे चि. विश्वास का विवाह हो चुका है। उसे वर्तमान में एक ही कन्या चि. विदुला है। मेरे उपरोक्त निवास ‘सावरकर सदन’ की व्यवथा इस तरह हो

अ. इस घर की पहली मंजिल पर पश्चिम की ओर का तीन कमरों का जो भाग है जिसमें एक रसोई, एक बीच का कमरा, अगला कमरा जिसमें मैं रहता था वह, और उसीसे लगा बैठक का बँगला, लकड़ी के विभाजक से बना उसके पीछे का कमरा, उसके पीछे का स्नानघर एवं शौचकूप, और उसी अगले भाग का अगला छज्जा – यह सारा भाग अपनी पुत्री, जिसका उल्लेख ऊपर आया है, चि. प्रभावती (सौ. प्रभावती चिपळूणकर) को मैंने दिया है। उसी तरह उन तीन जुड़े कमरों का नीचे का भूतल जो वैसा ही तीन कमरों का हिस्सा है, जो आज किराए से श्री अ.स. भिड़े को दिया हुआ है, वह और पिछले भाग में उसीके पड़ोस में बने स्नानघर और शौचकूप-यह सारा भाग भी चि. सौ. प्रभावती को ही मैं दे रहा हूँ। ऊपर दिए सारे हिस्से पर उस अकेली का ही स्वामित्व रहेगा। उसकी सारी व्यवस्था अपने मन के अनुसार वह चाहे जैसी करे। उसी तरह उस ऊपर के कमरे में स्थित काँच की आलमारियाँ और उसमें रखे चाँदी के मानपत्र आदि वस्तुएँ भी उसीको दी हुई हैं। बैठक के बँगले में लगी तसवीरें भी उसीको दी हैं।

आ. ऊपरी प्रथम मंजिल पर पूर्व की ओर जो दो कमरों का भाग है तथा उससे जुड़ा स्नानगृह और शौचकूप, उसी तरह इस ऊपर के भाग के नीचे भूतल पर जो दो कमरे और उससे जुड़े स्नानघर और शौचकूप का भाग, जो आज श्री ना.वि. दामले को किराए पर दिया है, वह भाग मैं चि. विश्वास को दे रहा हूँ। आँगन का मोटरघर भी चि. विश्वास को दिया है।

इ. मेरे निवास की व्यवस्था किस प्रकार करनी है, वह मैंने ऊपर कहा है। शेष रहा जो भाग अर्थात् अगला और चारों ओर का आँगन, बीच के रास्ते, सोपान (सीढ़ियाँ), छत, पानी की टंकियाँ आदि सावरकर सदन के उपरोक्त मालिक सहयोगी भावना से काम में लें। एक-दूसरे की सुविधा और समझदारी से उनका उपयोग करें। उसपर आनेवाला व्यय दोनों आपस में बाँट लिया करें। मतभेद होने पर मुख्य न्यासी श्री माधवराव चिपळूणकर, जिनका उल्लेख नीचे किया हुआ है, जो निर्णय देंगे, वह निर्णय हर मामले में माना जाए।

उ. भूतल का ऊपर उल्लिखित कमरों के दो भाग छोड़ देने पर लकड़ी से बने विभाजकों से विभाजित जो दो कमरे हैं- जहाँ पहले मेरा कार्यालय था- वे दोनों कमरे मैं श्री शां. शि. सावरकर उपनाम बालाराव सावरकर को कार्य हेतु दे रहा हूँ। उन कमरों में मेरे चरित्र से संबंधित सारे कागज-पत्र, ऊपरी मंजिल पर खोकों में रखे हुए नीचे लाकर इकट्ठा कर रखे जाएँ। उसी तरह मेरी सारी मुद्रित पुस्तकों की प्रतियाँ और हस्तलिखित भी वहीं सँभालकर रखी जाएँ। मेरे पुराने आवक-जावक सैकड़ों पत्रों का, छायाचित्रों का, पुस्तकों का और कागज-पत्रों का उपयोग कर और उनका ढंग से वर्गीकरण कर एक समग्र, सविस्तार, और साधार चरित्र प्रकाशित करने की यथासंभव व्यवस्था की जाए। इसके लिए उनके विश्वास के एक-दो अध्ययनशील सज्जन उस इतिहास लेखन में सहयोग देने आएँ तो उचित है, पर इससे अधिक उन कमरों का उपयोग किसी भी सार्वजनिक स्वरूप की संस्था या कार्य के लिए न किया जाए।

मेरा जो साहित्य पुणे में जिन खंडों में प्रकाशित हो रहा है, उसका संग्रह इन कमरों में किया जाए। उसके लिए और मेरे वाङ्मय के नए-नए संस्करण यथासंभव निकालने के लिए इन कमरों का उपयोग किया जाए। उन कमरों में सजी आलमारियाँ, कुरसियाँ, मेजें आदि जो वस्तुएँ वहाँ हैं उनका उपयोग बालाराव करें। प्रथम मंजिल पर रखी पुस्तकों की कुछ आलमारियाँ यदि सौ. प्रभावती चिपळूणकर उन्हें कहे तो नीचे ले जाएँ। इन कमरों का ऊपर कहे अनुसार उपयोग करने का अधिकार अकेले बालाराव को दिया है। इसके लिए बालाराव से कोई किराया या शुल्क न लिया जाए। इन कमरों के पीछे जो स्नानघर और संडास का कमरा है, उसका उपयोग भूतल पर रह रहे किसीको भी कष्टकर न हो, इस रीति से बालाराव कर सकेंगे। दस वर्ष तक इस काम के लिए इन कमरों का उपयोग किया जाए। दस वर्ष बाद उन्हें नीचे दिए हुए इस न्यास के मुख्य न्यासी श्री माधवराव चिपळूणकर को सौंप दिया जाए। इसके आगे उन कमरों की क्या व्यवस्था की जाए, वह निर्णय श्री माधवराव लें। उनका निर्णय अंतिम माना जाएगा। इस बीच इन कमरों को बालाराव किसी भी किराएदार को कभी भी न दें।

ए. मेरे वाङ्मय के पुनर्प्रकाशन का या हस्तलिखित पांडुलिपि के प्रथम प्रकाशन का, अलग-अलग संस्थाओं या व्यक्तियों से हुए मेरे अनुबंधों के संबंध में नए अनुबंध करने का, उन पुस्तकों को बेचने आदि का सर्वाधिकार मैंने श्री बालाराव को दिया हुआ है। उससे जो कुछ और यदि कुछ आमद होती है तो वह सब बालाराव लें। शर्त इतनी ही है कि वह सारा वाङ्मय यथासंभव बिक्री के लिए रखा जाए। प्रचार के लिए अवश्य योग्य संस्थाओं या व्यक्तियों को फुटकर पुस्तकें निःशुल्क बालाराव उचित समझें तो दें।

४. मेरी चल संपत्ति अर्थात् अमानतें, अंश पूँजी, डिबेंचर्स, बैंक का अवशेष आदि रूप में जो कुछ होगा उसकी कुल गणना मेरी मृत्यु के बाद मुख्य न्यासी श्री माधवराव चिपळूणकर को करनी है। आज जो चल संपत्ति है उसका इस विश्वस्त पत्र (Trust Deed) के द्वारा अंत में कच्चा परिशिष्ट दिया है।

उसमें से मेरे जीवित रहने तक कोई भी व्यय करने का या उसकी जी चाहे जैसी व्यवस्था करने का अधिकार मुझे ही है। उसके बाद मैंने ऊपर दिए अनुसार जो चल संपत्ति बचेगी, उसका विनियोग श्री माधवराव निम्नलिखित प्रकार करें –

अ. मेरे पुत्र चि. विश्वास की आयु वर्तमान में न्यून्याधिक ३६ वर्ष की है। उसकी शिक्षा, विवाह और उसका और उसके परिवार का सारा व्यय उसके न्यूनाधिक तीस वर्ष तक मैं ही अपनी प्राप्तियों से करता रहा हूँ। सामान्य रूप से छह वर्ष से वह नौकरी कर रहा है, तब भी उसका वेतन आज भी उसके स्वयं के व्यवहार तक ही पूरा पड़ता है। इस कारण उसका पारिवारिक एवं घरेलू व्यय भी अपनी संपत्ति से मुझे आज भी करना पड़ता है। उसके बीमे की किश्तें भी मैं ही भरता रहा। उन किश्तों को जब बंद करना मेरे लिए जरूरी हो गया तब शेष राशि जो प्राप्त हुई, वे पाँच हजार रुपए, मैंने उसके ही नाम पर जमा किए हुए हैं। उसी तरह उसने अपने नाम से जो अमानतें, अंश आदि में जो राशियाँ रखी हैं वो मैंने उसे दे दी हैं। मेरी पत्नी स्वर्गीय सौ. माई ७७ वर्ष की आयु में दिवंगत हुईं। उनका भी सारा व्यय मेरी संपत्ति में से ही किया गया। उसका किसी प्रकार का आर्थिक भार चि. विश्वास पर नहीं पड़ा है। उपरोक्तानुसार मेरी चल संपत्ति से चि. विश्वास को जो मिला होता, उस हिस्से से कितना ही अधिक हिस्सा उसे पहले ही मिल गया है। इस कारण ऊपर लिखे अनुसार मेरी ‘सावरकर सदन’ नामक अचल संपत्ति का साधारण एक-तिहाई ही मैंने उसे दिया है। पर मेरी कन्या चि. प्रभावती चिपळूणकर को मेरी चल संपत्ति का कुछ भी हिस्सा उस अनुपात में नहीं मिला। उसकी गृहस्थी का कोई भी दायित्व मुझपर नहीं पड़ा। उसको दो बच्चे हैं। इसके सिवाय भी इस न्यास पत्र के मुख्य न्यासी का काम उसके पति श्री माधवराव चिपळूणकर को ही करना है, इसलिए भी उन्हें कुछ पुरस्कार देना उचित है। इसके लिए मेरी ‘सावरकर सदन’ नामक अचल संपत्ति में से ऊपर दिए अनुसार अधिक भाग मैंने उसे दिया है।

आ. मेरी मृत्यु के बाद जो चल संपत्ति रहेगी, उसकी गणना कर नीचे उल्लिखित न्यासी श्री माधवराव चिपळूणकर उसमें से पहले रु. ५०००/- (रु. पाँच हजार) तक की संपत्ति चि. विदुला विश्वास सावरकर को विधि अनुसार उसके वयस्क होने पर उसे सौंपें । उसका विनियोग वह अपनी इच्छानुसार करे। उसके बाद यदि कुछ राशि शेष रहती है तो उसमें से रु.२०००/- (रु. दो हजार) तक की राशि मेरे भतीजे श्री विक्रम नारायण सावरकर को मेरे व्यक्तिगत उपहार के रूप में दी जाए। उसका विनियोग वह अपनी इच्छानुसार करें।

इ. उसके बाद कुछ और राशि बचे तो उसमें से पाँच हजार तक की राशि (संपत्ति) ‘शुद्धि निधि’ के लिए श्री बालाराव सावरकर और विक्रम नारायण सावरकर को सौंपी जाए। हर वर्ष, हर छह माह में जो संस्था जितनी शुद्धि वास्तविकता में करे उस – हर एक को हर शुद्धिकृत व्यक्ति के लिए एक रुपया की दर से सहायता दें। इसका चयन उपरिलिखित दोनों व्यक्तियों की सहमति से किया जाए।

उ. उपरोक्त पाँच हजार देने के बाद यदि मेरी संपत्ति से और कुछ राशि (संपत्ति) शेष रही तो वह समस्त संपत्ति मेरे नाती चि. प्रफुल्ल चिपळूणकर की शिक्षा के लिए श्री माधवराव चिपळूणकर को दे दी जाए।

५. मेरी मृत्यु होते ही मेरा शव यथासंभव विद्युत् चिता पर जलाया जाए। पुरानी पद्धति के अनुसार मेरा शव आदमी अपने कंधे पर न ले जाएँ या किसी भी प्राणी की गाड़ी से न ले जाया जाए। उसे यांत्रिक शववाहिका से ही विद्युत् श्मशान में ले जाया जाए। विद्युत् श्मशान के सभागृह में कोई चाहे तो वेदमंत्र पढ़े, भाषण करे। मेरी मृत्यु के कारण कोई अपनी दुकान या व्यवसाय बंद नहीं रखे, क्योंकि जिसे दुःख होगा वह भी इस तरह का प्रदर्शन करे तो उस आंशिक हड़ताल से भी समाज को कष्ट होता है। घर-गृहस्थी के लिए दैनिक आवश्यकता की वस्तुएँ न मिलने से कष्ट होता है। यदि किसीको दुःख हुआ और उसका कुछ प्रदर्शन करने की इच्छा हो तो सभा आयोजित की जाए और अपना शोक व्यक्त किया जाए। मेरे निधन पर कोई भी सूतक आदि की, जिससे परिवारजनों को या समाज को अकारण कष्ट हो ऐसी पुरानी रूढ़ि का पालन न करें या पिंड प्रदान, उन पिंडों को काक स्पर्श होने तक वह राह तकेगा आदि काल बाह्य बातों का पालन न करें। यदि किसीको मेरे निधन के कारण नए अर्थ में श्राद्ध के रूप में कुछ दान-धर्म करने की इच्छा हो तो जिनसे लोगों को प्रत्यक्ष लाभ होता है ऐसी हिंदुत्वनिष्ठ संस्थाओं को दान-धर्म करें।

६. इस मृत्युपत्र में उपरोक्तानुसार सारी व्यवस्था करने का, उससे संबंधितों को कुछ आशंका आने पर उसका स्वमत से निराकरण करने का काम मेरे दामाद श्री माधवराव चिपळूणकर करें। उनका निर्णय सबको स्वीकार करना होगा। इस मृत्यु – पत्र (व्यवस्था-पत्र) से उन्हींको मैंने एकमात्र न्यासी (Trustee) नियुक्त किया है। श्री माधवराव से मैंने पूछा तो उन्होंने सारा दायित्व लेने और ये काम करने के लिए अपनी स्वीकृति दी।

लगभग अठारह वर्ष पहले जब मैं बालचंद नगर में बीमार था, मैंने एक मृत्यु-पत्र लिखा था। वह या पूर्व में लिखा हुआ वैसा कोई भी मृत्यु – पत्र या Attorney Deed हो तो भी इस आज के मृत्यु – पत्र के अधीन (व्यवस्था-पत्र से) उसे रद्द कर रहा हूँ। इसके आगे यही मेरा अकेला एक मृत्यु-पत्र है, यह माना जाए।

७. यह व्यवस्था-पत्र मैंने स्वेच्छा से जानते, समझते, मन की उत्तम स्थिति में लिखकर रखा है और उसपर दो साक्षियों के हस्ताक्षर मेरे सामने ही लिये गए हैं और मैंने भी अपने हस्ताक्षर उसपर किए हैं।

हस्ताक्षर

विनायक दामोदर सावरकर
साक्षियों के हस्ताक्षर :

१. नारायण विष्णु दामले

२. बाल जेरे


संदर्भ – समग्र सावरकर वांग्मय खंड 2

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