जैन-बौद्धों की अहिंसा गांधीजी की अहिंसा से भिन्न है ! – वीर सावरकर

बौद्धधर्म या जैनधर्म द्वारा प्रतिपादित अहिंसाधर्म, गांधीजी द्वारा प्रतिपादित उस आत्यन्तिक अहिंसाधर्म के सर्वथा विरुद्ध है। जो  सभी प्रकार की परिस्थितियों में सशस्त्र प्रतिकार का निषेध करती है। जिन जैन लोगों ने राज्य स्थापित किये, वीर एवं वीरांगनाओं को निर्मित किया, जिन्होंने समरभूमि पर शस्त्रों से युद्ध किये तथा जिन जैन सेनापतियों ने जैन सैनिकों की सेनाएँ लड़ाई, उनका जैन आचार्यों ने कहीं भी तथा कभी भी निषेध नहीं किया है। यह एक ही बात सिद्ध करती है कि उनकी अहिंसा गांधीवादी घृणित अहिंसा से भिन्न थी । इतना ही नहीं तो अन्यायकारी आक्रमण का सशस्त्र प्रतिकार करना केवल न्याय ही न होकर आवश्यक भी है, ऐसा जैनधर्म का प्रकट प्रतिपादन है। यदि कोई सशस्त्र आततायी मनुष्य किसी साधु की हत्या करने का प्रयास करे, तो उन साधु के प्राणरक्षणहेतु उस आततायी को मार डालना यदि आवश्यक हो तो उसे अवश्य ही मारना चाहिये, क्योंकि, उस प्रकार की हिंसा एक प्रकार से अहिंसा ही है ऐसा उसका समर्थन जैनग्रन्थों ने किया है । मनुस्मृति के कथनानुसार ही जैनग्रन्थों का भी यह कथन है कि ऐसी परिस्थिति में हत्या का पाप उसे लगता है जो मूलभूत हत्यारा है, न कि उसे, जो हत्यारे का वध करने वाला है, ‘ मन्युस्तन् मन्युमर्हति । ‘ भगवान् बुद्ध ने भी इसी प्रकार का उपदेश किया है। एक बार किसी टोली के नेता भगवान् बुद्ध के पास पहुँचे और किसी अन्य टोली के लोगों के आक्रमण के विरुद्ध उनका सशस्त्र प्रतिकार करने की अनुज्ञा उनसे माँगने लगे, तब तथागत बुद्ध ने उन्हें सशस्त्र प्रतिकार करने की आज्ञा दी । भगवान् बुद्ध बोले, “ सशस्त्र आक्रमण के प्रतिकार स्वरूप युद्ध करने में क्षत्रियों के लिए कोई भी बाधा नहीं है। यदि सत्कार्य के लिए वे सशस्त्र होकर लड़ते है तो उन्हें कोई पाप नहीं लगेगा । ” 

-वीर सावरकर
हिंदुत्व के पांच प्राण

 

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