Home Article डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार : हमारे मूर्तिमान आदर्श

डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार : हमारे मूर्तिमान आदर्श

संघ शिक्षा वर्ग ( तृतीय वर्ष ) नागपुर में श्री गुरूजी के बौद्धिक वर्ग से संकलित।


जन्मजात देशभक्त


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. केशव बलीराम हेडगेवार का जन्म नागपुर में १८८६ में हुआ। अपने बाल्य-काल से अन्तिम क्षण पर्यन्त उनका जीवन मातृभूमि के निमित्त एकसतत जलनेवाले दीपक की स्थिर ज्योति केसमान जलता रहा। आठवर्षकी बाल्यावस्था में ही उन्होंने विक्टोरिया महारानी के जन्म-दिवस पर स्कूल में दी गई मिठाई को घृणा के साथ यह कहते हुए फेंक दिया कि यह दासता का द्योतक है। अपने गुरुजनों को वे अपने विचित्र प्रश्नों द्वारा चकित कर दिया करते थे। वे पूछते थे – हजारों मील की दूरी से आने वाले ये अंग्रेज हमारे शासक कैसे बन गए?’ जब वे हाईस्कूल में थे, वे नागपुर के विद्यार्थियों में ‘बन्देमातरम्’ आन्दोलन की ज्योति प्रज्ज्वलित करने के कारण स्कूल से निकाल दिए गए थे। ऐसा प्रतीत होता है मानो विशुद्ध देशभक्ति की भावना उन्होंने अपनी माता के उदर से ही ग्रहण की थी।


असामान्यों में भी दुर्लभ


पूना से हाईस्कूल उत्तीर्ण करने के पश्चात् उन्होंने क्रान्तिकारियों के आन्दोलन का अध्ययन निकट से करने तथा उसमें भाग लेने के लिए कलकत्ता जाने का निश्चय किया, जो उस समय उन लोगों का आवास माना जाता था। वे शीघ्र ही बंगालियों के जीवन तथा रीति-रिवाजों के साथ समरस हो गए। वे वहां विभिन्न राजनीतिक तथा सामाजिक गतिविधियों में निम्न हो गए और शीघ्र ही देश के सभी भागों से आये हुए देशभक्त युवकों के एक समूह के प्रेरणा केन्द्र बन गए।

जब वे तरुण एवं प्रतिभाशाली डाक्टर के रूप में नागपुर लौटे, तो उनके अपेक्षित भावी उज्ज्वल जीवन’ की मुग्ध आशाएं लिए अनेक नेत्र उनकी ओर देख रहे थे। विवाह के अनेक प्रस्ताव भी उनसे किए गए, किन्तु उनका जीवन परिवार की संकुचित सीमाओं में आबद्ध रहने वाला जीवन नहीं था ऐसे सब प्रस्तावों के प्रति अन्तिम उत्तर के रूप में उन्होंने अपने चाचा श्री आबाजी हेडगेवार को लिखा – मेरा । जीवन एक आदर्श के हेतु प्रतिज्ञाबद्ध है। मैंने उसकी वेदी पर अपने सर्वस्व की बाजी लगा दी है। ऐसी अवस्था में निजी सुखोपभोग या पारिवारिक जीवन के लिए मेरे पास अवकाश एवं शक्ति कैसे सम्भव है ?’

यह स्मरण रखना चाहिए कि उनका जन्म निपट दारिद्र्य में पिस रहे परिवार में हुआ था। हममें राष्ट्र-कार्य के लिए आगे आने वाले ऐसे व्यक्ति मिल सकते है जो सम्पन्नता में जन्मे हैं तथा जिनको अपने अथवा अपने बन्धु-बान्धवों की उदरपूर्ति के लिए चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, यद्यपि निःसन्देह ऐसे उदाहरण भी बिरले ही होते हैं। परन्तु डाक्टरजी इन असामान्यों में भी दुर्लभ थे। यद्यपि निपट दारिद्र्य एवं अर्द्ध-बुभुक्षा से उनका सामना था, फिर भी उन्होंने अपने अथवा अपने परिवार के लिए कभी एक पैसा भी कमाने का विचार तक नहीं किया । यद्यपि वे एक डाक्टर थे, उन्होंने कभी डाक्टरी नहीं की। उन्होंने ‘राष्ट्र का डाक्टर’ बनना अधिक पसन्द किया।


एक दीप के सदृश


उनके अन्त समय तक भयानक गरीबी उनकी अविचल सहचरी बनी रही। महीनों वे दिन में एक बार भोजन, सो भी कठिनता से पाकर ही चलते रहे। बहुत बार उनके कपड़े फटे रहते थे। जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं का अभाव उन्हें सदैव ही बना रहा।

एक दिन एक सज्जन डाक्टर जी से मिलने आये। जैसे ही बातचीत समाप्त होने वाली थी, डाक्टर जी ने उनसे चाय पीने के लिए रुकने का अनुरोध किया और अपनी भाभी को चाय तैयार करने के लिए कहलवाया। दस मिनट व्यतीत हो गए और चाय नहीं आई। दूसरे दस मिनट गए चाय फिर भी नहीं आई। वह सज्जन जाने की जल्दी में थे। मामला क्या है, यह जानने के लिए डाक्टर जी अन्दर गए और उन्हें ठण्डै पानी तथा एक कोने में चुपचाप बैठी अपनी भाभी के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई दिया। बाजार जाने और आवश्यक वस्तुएं लाने के लिए भी और कोई नहीं था, अत: डाक्टर जी स्वयं बाहर गए, चीनी एवं चाय की पत्ती लाये और कुछ समय के पश्चात् उन सज्जन को चाय पिलाई गई। वे सज्जन पर्याप्त चतुर थे और स्थिति को समझ गए। उस समय तक उनको डाक्टरजी की आर्थिक दुरावस्था का किंचित भी आभास नहीं था, यद्यपि वे उनसे बहुत काल से परिचित थे। वास्तव में डाक्टरजी का सदैव मुस्कुराता हुआ चेहरा, उनसे विकीर्ण होने वाला समुत्साह, उनकी संक्रामक हैंसी, सब और उल्लास एवं माधुर्य बिखेरने वाला उनका मोहक व्यवहार देखकर जिस कठोर स्थिति में वे रह रहे थे, उनकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था। वे एक ज्योति के समान थे जो स्वयं मौन जलती रहती है परन्तु सब ओर आणता तथा प्रकाश बिखेरती रहती है।

उस घटना के तुरन्त पश्चात उन सज्जन ने मुझे बुलाया और डाक्टरजी की आर्थिक स्थिति के बारे में विस्तारपूर्वक पूछा । उनकी निर्धनता की चरम स्थिति को जानकर वे स्तम्भित रह गए। वे उद्विग्न हो उठे और नाराज होकर मुझसे पूछा- ‘आपने उनकी आर्थिक चिन्ताओं को दूर करने का प्रबन्ध क्यों नहीं किया?’ मैंने उत्तर दिया- ‘एकादशी शिवरात्रि की उदरपूर्ति कैसे कर सकती हैं ?’ वे क्षण भर के लिए गम्भीर हो गए और मुझसे कहा – ‘मैं यह कदापि सहन नहीं कर सकता। आपको मुझसे कम से कम उनके अतिथियों का खर्च चलाने के लिए प्रत्येक माह २५ रुपया अवश्य स्वीकार करना चाहिए। परन्तु ध्यान रहे यह बात डाक्टरजी के कान तक न पहुंचनी चाहिए।’ मैंने उन्हें सुझाव दिया कि वे स्वयं डाक्टर जी से प्रस्ताव करें । परन्तु इस बारे में डाक्टर जी के दृढ़ विचारों को जानते हुए डाक्टर जी से इस विषय पर बात छेड़ने का साहस नहीं हुआ और बात यहीं समाप्त हो गई।


एक सूक्ति भी असत्य सिद्ध हुई


अपने प्रचण्ड आदर्शवाद के अतिरिक्त वे सर्व सद्गुणों में असामान्य गुण, जीवन में स्वीकार किए हुए लक्ष्य के अनुकूल अपने आप को गढ़ने की इच्छा के ज्वलन्त उपमान थे। अपनी उग्र एवं साहसी प्रकृति के लिए सुपरिचित एक परिवार में उनका जन्म हुआ था। डाक्टर जी ने भी उस ‘पैतृक विरासत’ को ज्यों का यो उत्तराधिकार में प्राप्त किया। बहुधा ऐसा कहा जाता है कि पैतृक प्रवृत्तियों तथा स्वभाव बदलना अत्यन्त कठिन होता है ‘स्वभावे दुरतिक्रमः’ । यह विचित्र लोकोक्ति व्यक्ति को अपने माता-पिता के चयन में सावधान रहना चाहिए इसी विचार को अभिव्यक्त करती है। किन्तु डाक्टरजी ने ऐसे सभी आत्म-दुर्बलकारी विचारों को मिथ्या सिद्ध कर दिया। जिस दिन से उन्होंने एक ऐसे संगठन का निर्माण करने का निश्चय किया, जिसमें विभिन्न प्रकृतियों तथा गुणों के व्यक्तियों को एक में मिलाकर एक संगठित एवं सामंजस्य पूर्ण समष्टि का निर्माण करना था, उन्होंने स्वयं को बदल डालने का निश्चय कर लिया। जिन्होंने उनको पहले देखा था, वे उनको पूर्णतया बदले हुए देखकर आश्चर्यचकित हुए। उनके द्वारा संगठन की स्थापना के पश्चात् शायद ही किसी ने उनको कठोर शब्द प्रयोग करते हुए अथवा उग्रतम उत्तेजना के अवसर पर भी विक्षुब्ध होते हुए देखा होगा । यदि कोई उनसे कठोरता के साथ बोलता भी था, तो वे मुस्कुरा भर देते थे और वह मुस्कुराहट विरोध की तीक्ष्णता को समाप्त कर देती थी। निःसन्देह, उनकी अन्तरतम की ज्वाला कभी फूट भी पड़ती थी, परन्तु ऐसा तभी होता था जबकि वे हमारे राष्ट्र पर अपमान तथा कलंक की बौछार होते तथा हमारे समाज द्वारा उन सबको चुपचाप सहन करते हुए देखते थे।

अविचल रहकर तथा विलक्षण आत्म-चेष्टा द्वारा उन्होंने हमारी सांस्कृतिक परम्परा के उच्चतम मूल्यों पर आधारित राष्ट्रीय पुनर्गठन के जीवन लक्ष्य के लिए समर्पित कार्यकर्ता के एक प्रेरक एवं जीवन्त उदाहरण के रूप में स्वयं के प्रत्येक सूक्ष्म विवरण को परिवर्तित कर लिया था। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर यह समझ लिया था कि उग्र सार्वजनिक भाषण, अवसर पर भले ही जोश पैदा कर दें, परन्तु वे समर्पित हृदयों के एक ऐसे सक्षम संगठन के निर्माण में कभी सहायक नहीं हो सकते जो विपत्तियों तथा प्रलोभनों के सभी झंझावातों में एक स्थिर लौ के समान जलता रहेगा। इसके विपरीत ऐसे उग्र भाषण, अपने विरोधियों की आलोचना करने तथा उनका दोष दर्शन कराने में सस्ता संतोष प्राप्त करने की एक मनोवृत्ति को जन्म देकर, संगठन को अज्ञान में ही क्यों न हो, हानि ही पहुंचायेंगे। इस प्रकार की मनोवृत्ति का संघ जैसे संगठन में कोई स्थान नहीं हो सकता था, जो समाज में स्वपरिष्कार के लिए प्रयत्नशील था, क्योंकि वह इतिहास की उस एक शिक्षा से परिचित था कि बाहर वाले नहीं, अपितु हमारा समाज ही हमारे सभी पतन तथा विनाश के लिए उत्तरदायी है।

संघ का प्रारंभ करने के पूर्व, डाक्टर जी स्वयं एक उग्र वक्ता थे, सन् १६२१ में असहयोग आन्दोलन के दिनों में, वे अपने एक उग्र भाषण के कारण गिरफ्तार कर लिए गए थे। वे राजद्रोह के अभियोग में न्यायालय के सामने प्रस्तुत किए गए। न्यायालय में उनके तेजस्वी प्रतिवाद को सुनकर मजिस्ट्रेट ने कहा था कि – ‘उनका प्रतिवाद उनके मूल भाषण से भी अधिक द्रोहात्मक है। परन्तु संघ प्रारंभ करने के पश्चात् उन्होंने अपनी भावाभिव्यक्तियों को पूर्णतया नियंत्रित किया। तत्पश्चात् उनके भाषण कभी भी उत्तेजक तथा उग्र नहीं होते थे, यद्यपि वे भावनापूर्ण तथा ज्वलनशील होने के कारण श्रोताओं के हृदय में प्रवेश कर जाते थे। अनौपचारिक 1. वार्तालाप में भी उनके शब्द माधुर्य एवं अन्तःकरण को प्रभावित करने वाले गुण से युक्त होते थे। उन्होंने अनुभव के आधार पर यह जान लिया था कि वाणी की मिठास राष्ट्र के संगठनकर्ता के लिए एक अपरिहार्य गुण है।


युधिष्ठिर का अवतार


इस सब परिवर्तन में कृत्रिमता अथवा दिखावटी ऐसा कुछ नहीं था यह परिवर्तन इतना पक्का तथा स्थायी था कि वह उनकी प्रकृति की रचना ही बन गया और उनके विचार, शब्द तथा क्रिया में स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होने लगा उनकी लोकप्रियता ऐसी नहीं थी जो बहुधा दूरी के कारण हो जाया करती है और जो निकट के सम्पर्क तथा परख पर साबुन के बुलबुले के समान अदृश्य हो जाती है एक कहावत है – ‘कोई महान् व्यक्ति अपने ही पार्श्व सेवक के लिए महान नहीं होता। परन्तु उनके विषय में यथार्थ इसके विपरीत था। जो जितना अधिक उनके निकट आता वह उनका उतना ही अधिक अनुरागी तथा पूजक बन जाता। उनका निजी तथा सार्वजनिक चारित्र्य एक सा ही था, एक मधुर संतुलित व्यक्तित्व । इतना पवित्र, उदात्त तेजस्वी तथा पारदर्शी था उनका चरित्र कि जो सार्वजनिक क्षेत्र में उनका विरोध करते थे, उनके भी पास उनके निजी व्यक्तित्व की निन्दा अथवा अवमानना करने के लिए एक भी शब्द नहीं रहता था।

नागपुर में श्री अभ्यंकर नाम के एक प्रसिद्ध बैरिस्टर थे जो उस प्रान्त के एक अग्रणी राजनीतिक व्यक्ति थे। उनकी गरजती हुई आवाज थी और वे विरोधियों के चरित्र के दोष ढूंढ निकालने में अति पटु थे। चुनाव के दिनों में अपने विरोधियों के दोषों को प्रकट करने तथा उन्हें नीचा दिखाने के लिए अपने इन गुण-विशेषों का वे पूरा-पूरा उपयोग किया करते थे। एक बार डा. मुंजे चुनावों में उनके विरुद्ध खड़े बैरिस्टर अभ्यंकर ने समझा कि डा. मुंजे के एक प्रधान समर्थक हैं, डाक्टरजी हुए। तथा उनका संघ। अत: उन्होंने अपने सार्वजनिक भाषण में डाक्टर जी तथा संघ पर आक्षेप करने का निर्णय किया। वे अपने भाषण में डा. मुंजे के प्रत्येक समर्थक के विरुद्ध आक्षेप लगाते रहे, परन्तु जब उन्होंने डाक्टर जी के विषय में बोलना प्रारंभ किया, उनका स्वर तुरन्त नरम हो गया और उन्होंने यह स्पष्ट स्वीकार किया कि वे डा. हेडगेवार की निन्दा स्वरूप एक शब्द भी नहीं ढूंढ सकते। तनिक कल्पना कीजिए एक विषाक्त चुनाव आन्दोलन के बीच ऐसे एक सार्वजनिक स्वीकारोक्ति की और वह भी एक ऐसे व्यक्ति द्वारा ।

वास्तव में डाक्टर जी के सम्बन्ध अपने विरोधियों से भी इतने अधिक गहरे हो जाते थे कि ऊपरी मतभेदों का उन पर प्रभाव नहीं हो पाता था। अपने कलकत्ता प्रवास के दिनों से ही उन्होंने राष्ट्रोद्धार के निमित्त संलग्न सभी व्यक्तियों तथा संस्थाओं के प्रति, भले ही वे उनसे मतभिन्नता रखते हों, स्नेह, आदर तथा सहयोग का भाव निर्माण कर लिया था। राजनीतिक विद्वेष का भाव उनमें लेशमात्र भी न था। उनके हृदय में देशभक्ति 1. की ज्वाला इतनी प्रकाशमान् थी कि संकीर्ण विचारों की छाया उनके समीप कहीं फटक भी न पाती थी।

एक समय एक मित्र अपने लिए ५०० के ऋण का प्रबंध कराने के लिए रात्रि में डाक्टर जी के पास आये। लगभग मध्यरात्रि का समय था। डाक्टर जी दुविधा में पड़ गए। तथापि वे उठे, सीधे श्री अभ्यंकर के पास गए और आवश्यकता बताई। बिना एक शब्द कहे, श्री अभ्यंकर उतना रुपया लाये और डाक्टर जी को दे दिया । डाक्टर जी ने उनसे कागज कलम लाने को कहा जिससे कि वे प्रामिसरी नोट लिख सकें। श्री अभ्यंकर सहसा बोल उठे ‘डाक्टर साहेब, क्या मेरा दिमाग खराब हो गया है जो मैं डा. हेडगेवार से प्रामिसरी नोट लूं । सारा नागपुर मुझ पर हँसेगा।’

उनके प्रति ऐसा पूर्ण विश्वास और श्रद्धा-भाव उनके सार्वजनिक जीवन के प्रतिपक्षी कहे जाने वाले व्यक्तियों के अन्तःकरण में भी जाग्रत था जो उनके विशुद्ध चारित्र्य के कारण निर्माण हुआ था। वे युधिष्ठिर के समान थे जो दुर्योधन को भी सुयोधन कह कर सम्बोधित करते थे। जब युद्ध क्षेत्र में अश्वत्थामा के निधन का समाचार फैला, तब द्रोणाचार्य ने इसकी सत्यता को अपने मुख्य प्रतिपक्षी, युधिष्ठिर से प्रमाणित कराने का निश्चय किया उनके आचरण की साधुता कुछ ऐसी थी कि जो उनके मित्र तथा शत्रु दोनों ही समान रूप से उनमें विश्वास रखते थे। डाक्टर जी मानो युधिष्ठिर के आधुनिक अवतार थे। सचमुच वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिनका कोई शत्रु न था, सब केवल मित्र ही थे, वे अजातशत्रु थे।

एक समय मध्यप्रदेश की सरकार को यह भय हो गया कि कहीं संघ की बढ़ती हुई शक्ति के कारण प्रान्त में ‘साम्प्रदायिक शान्ति’ भंग न हो जाय । सरकार ने १६३२ में अपने कर्मचारियों द्वारा संघ की गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबन्ध लगाते हुए एक परिपत्र प्रसारित किया। नगरपालिकाओं तथा जिला परिषदों को भी ऐसे ही पग उठाने का परामर्श दिया गया। सरकार के इस विचार-शून्य तथा राष्ट्र-विरोधी पग उठाने के कारण प्रान्त में एक कोलाहल मच गया। इसकी प्रतिध्वनि प्रान्तीय विधानसभा में भी हुई। सरकार के विरुद्ध विधानसभा में एक निन्दा प्रस्ताव रखा गया और इसका समर्थन केवल हिन्दू सदस्यों ने ही नहीं, अपितु मुस्लिम ईसाई, पारसी तथा अन्य सभी सदस्यों ने भी किया और उसके थोड़े दिनों बाद ही मंत्रिमण्डल को ही त्यागपत्र देना पड़ गया।


अजेय


उनके चरित्र के इस वैशिष्ट्य के कारण उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी शक्ति उत्पन्न हो गई थी कि ऐसे व्यक्ति भी जो अपनी उद्दण्डता तथा अक्खड़पन के लिए कुख्यात थे, डाक्टरजी की उपस्थिति में शिष्ट तथा भद्र तरीके से व्यवहार करते थे। नागपुर में एक व्यक्ति था जो अपने आपको ‘जनरल’ कहता था उसने यह कसम उठा रखी थी कि वह ऐसी किसी सभा को बिना भंग किये नहीं छोड़ेगा जिसका कि उसको अध्यक्ष नहीं बनाया जायेगा। उस ‘जनरल’ के पास गुण्डों की एक फौज थी जो ऐसी किसी भी ‘अनाधिकृत’ सभा पर टूट पड़ती थी और कुछ ही मिनटों में सभा हुल्लड़ तथा अव्यवस्था में समाप्त हो जाती। उन दिनों में डाक्टरजी के एक बाहर से आए हुए मित्र को नागपुर में एक सभा में भाषण करना था । परन्तु सभा के आयोजकों को बड़ी आशंका थी कि जनरल’ उस सभा को होने नहीं देगा। परन्तु डाक्टरजी के निश्छल आश्वासन के कारण उनको विश्वास हुआ और उन्होंने सभा का आयोजन किया। जैसे ही सभा प्रारम्भ हुई ‘जनरल’ अपनी फौज के साथ आ धमका। उसको आते हुए देखकर डाक्टर जी उठे और बड़ी सहृदयता के साथ उसका स्वागत किया और उसे अपने साथ बाजू में बैठा लिया। वक्ता भी अपने पूर्ण जोश में थे और उन्होंने उस दल की जिससे ‘जनरल’ सम्बन्धित था, खूब आलोचना की। ‘जनरल’ क्रोध के कारण गर्म हो रहा था तथा कभी इधर और कभी उधर देख रहा था किन्तु बगल में बैठे हुए डाक्टर जी की शान्त, दृढ़ तथा भव्य आकृति को देखकर उसके शरीर में एक शीतल कम्पन हो उठता था और वह विवश सा होकर अपनी कुर्सी पर बार-बार बैठ जाता था। सभा दो घण्टे तक शान्तिपूर्वक चलती रही। सभा की समाप्ति के पश्चात् उसके अनुयाइयों ने चुपचाप बैठे रहने के लिए प्रश्नों की बौछार कर दी। उसने इतना ही कहा – ‘मैं क्या कर सकता था। वह मनुष्य मेरे बगल में बैठा हुआ था।


अनुपम ऐक्यकारी


अगिणत संख्या में व्यक्तियों को एक साथ रखना, उनमें से प्रत्येक को एक आदर्श राष्ट्रीय कार्यकर्ता की कल्पना के अनुसार ढालना और आगामी पीढ़ियों के लिए एक सम्पूर्ण राष्ट्र के संगठित जीवन के आधार स्वरूप स्थायी परम्पराएं तथा प्रेरणादायक उपमान स्थापित करना, सचमुच चिन्ताओं तथा यन्त्रणाओं का पहाड़ जैसा कितना बड़ा बोझ वे अपने वक्ष-स्थल पर उठाकर चल रहे होंगे – और यह सब निजी जीवन की अत्यन्त कठोर परिस्थितियों के बने रहते हुए । परन्तु सर्वाधिक विस्मयजनक पक्ष यह था कि उनके जीवन के प्रत्येक क्षण उनके शरीर में प्रवाहित इस गहन अन्त:धारा का अनुमान कोई भी न लगा पाता था। जो कोई भी उनके सम्पर्क में आया वह डाक्टर जी से नित्य नूतन प्रवाहित आनन्द तथा उल्लास के निर्मल स्रोत में स्नान करके ही वापिस लौटता। उन्हें जो व्यक्ति सदा घेरे रहते थे वे विभिन्न तथा असमान प्रकार के होते थे। उनके मित्र मज़ाक में उनसे कहा करते थे, कि डाक्टर जी. एक ‘मानव जीवशाला’ चला रहे हैं। डाक्टरजी के साहचर्य में इस जीवशाला को कोई भी व्यक्ति अपने को असंगत अनुभव नहीं करता था। युवा तथा वृद्ध, परम्परावादी तथा नूतनवादी, शिक्षित तथा अशिक्षित, धनी तथा निर्धन सभी को उनमें एक समान तत्व का आभास मिलता था। ऐसी थी समरसता की उनकी भावना, ऐसी थी उनकी निपुणता की व्याप्ति । उनके लिए कोई भी व्यक्ति व्यर्थ नहीं था, भले ही अन्यों की दृष्टि में वह कितना ही छोटा तथा अपूर्ण हो ।


आत्म-विलोपित


उस असाधारण गुण के मूल में थी अहं के लेशमात्र से भी अविकृत, पूर्ण विनम्रता की भावना । नाम तथा ख्याति, पद तथा सत्ता प्राप्ति के पागलपन ने उनको कभी छुआ तक नहीं । संघ के प्रारम्भ के समय से ही, वे अविरत एक उपयुक्त व्यक्ति की तलाश में लगे रहे जो संगठन नेतृत्व कर सके और वे स्वयं उसके तुच्छ अनुयायी बने रहना चाहते थे, जिससे कि सभी अन्य कार्यकर्ताओं के लिए एक जीवित उदाहरण स्थापित हो । वास्तव में उन्होंने एक बड़े हिन्दू नेता को इसका प्रधान बनाने का बार-बार प्रयास किया परन्तु वह व्यर्थ हुआ। वह बड़ा आदमी, उसके सभी अन्य गुणों के बावजूद संघ में निहित उसकी शक्ति-क्षमताओं को पहचान न सका और उस ऐतिहासिक भूमिका के लिए मानसिक निश्चय न कर सका । डाक्टर जी को इससे दु:ख एवं निराशा हुई परन्तु उन्होंने अपनी तलाश जारी रखी। वे अपने सद्गुणो की श्रेष्ठता मात्र के कारण सहजतः संगठन के नायक उसी प्रकार बने रहे, जैसे एक सिंह जंगल का निसर्गतः राजा होता है – स्वयंमेव मृगेन्द्रता । परन्तु, वे अन्त समय तक स्वयं को उस स्थिति से समन्वित न कर सके।

अत्युच्च व्यक्तित्व के होते हुए भी डाक्टर जी ने कभी भी बड़प्पन का प्रदर्शन नहीं किया। वे अपने कार्यकर्ताओं तथा स्वयंसेवकों द्वारा उनकी प्रशंसा में स्वाभाविक तथा स्वयंस्फूर्त व्यक्त होने वाली अभिव्यक्तियों पर भी रोक लगाते थे । वे इस विषय में अत्यन्त आग्रही थे। १६४० में वे पूना के शिक्षण शिविर में रहकर नागपुर लौट रहे थे। मैं उनको लेने के लिए स्टेशन गया हुआ था। जैसे ही गाड़ी आई, हम लोगों ने उनको डिब्बे के दरवाजे पर खड़े हुए देखा। उनका चेहरा मुस्कुराहट से भरा हुआ था। जैसे ही मैं उनको पुष्पमाला पहनाने के लिए आगे बढ़ा, मैंने उनकी कठोर निषेधात्मक दृष्टि को देखा। मैं आधे हाथ फैलाए हुए बीच में ही रुक गया । तुरन्त ही वे मुस्कुराए और कहने लगे ‘मैं अपने ही घर आया हूँ। इस सबकी क्या आवश्यकता है वास्तव में हमें अपने सम्मानित अतिथि का स्वागत करना चाहिए।’ और उन्होंने उन सज्जन की ओर इंगित किया जो उनके साथ थे। मैंने वह माला उनको भेंट कर दी। मुझे डाक्टर जी को उनके जीवन भर माला पहनाने का अवसर नहीं मिला। उनके हमें छोड़ जाने के पश्चात् मैं उनके शरीर को ही माला पहना सका । वे फोटो खिंचवाने के भी ऐसे ही विमुख थे। कभी बिरले ही तथा अपने कार्यकर्ताओं के साथ दीर्घ कश्मकश के बाद ही वे फोटो लिए जाने की स्वीकृति देते ।

यद्यपि वे अपने प्रति कठोर तथा निष्ठुर थे, हम सब में से प्रत्येक के लिए वे स्नेह के सागर थे कोई शब्द उनके पवित्र तथा स्वार्थरहित स्नेह की गहराई का वर्णन करने के लिए अपर्याप्त है। मातृ-हृदय का असीम स्नेह, पिता की सतत चिन्ता और परिश्रम तथा गुरु का प्रेरणादायी मार्गदर्शन, ये उस एक वक्षस्थल में पराकाष्ठा को प्राप्त थे। मैं तो उनकी एक आदर्श के रूप में पूजा करने में स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता हूँ। ऐसे व्यक्तित्व की पूजा एक व्यक्ति की पूजा से ऊपर होती है और स्वयं एक आदर्श की पूजा बन जाती है। वे निश्चित ही मेरे इष्टदेव हैं।


कृति का दर्शन-शास्त्र


एकान्तिक निष्ठा, विशुद्ध चारित्र्य, अनुपम संगठनात्मक कौशल्य, अपने जीवन कार्य के रूप में अपनाए हुए उद्देश्य की अन्तिम सफलता में अदम्य विश्वास और उद्योग एवं परिश्रम करने की अमित क्षमता, यह थी उनके प्रयास की एकमात्र पूंजी। उन्होंने अपनी चेष्टा में कोई कमी नहीं रखी तथा अपनी शारीरिक आवश्यकताओं का तनिक भी ध्यान नहीं रखा, यहां तक कि उनके अन्तिम वर्षों में गिरते हुए स्वास्थ्य के कारण भी उनके शारीरिक एवं मानसिक परिश्रम में कोई कमी नहीं आ सकी। उनके सहकारी उनके बिगड़ते हुए स्वास्थ्य के विषय में चिन्ता से ग्रस्त थे। कुछ ने उनको चेतावनी भी दी कि उनका शरीर अधिक समय नहीं चलेगा यदि उन्होंने वही कठोर श्रम जारी रखा। किन्तु वे ऐसे सब प्रश्नों का एक सामान्य से वाक्य में उत्तर देते – ‘आखिरकार मेरा शरीर कार्य के निमित्त ही तो है’ और उस विषय को समाप्त कर देते। वे कोई आराम अथवा अवकाश जानते न थे। उनका दर्शन-शास्त्र था कार्य। वे अविरत तथा प्रखर कार्य करते रहने के पक्ष में थे, विशेषतया यौवनकाल में। वे पूछा करते थे ‘अपनी आयु को बुढ़ापे तक, जब शरीर किसी कर्मठ गतिमान कार्य के लिए बेकार खींचते यदि अपने सह-कार्यकर्ताओं लिए कहीं जाना स्वीकार कर लेते शाखाएं प्रारंभ किये बिना

एक बार १६३६ में उनका रोग बहुत उग्र हो डाक्टरों ने उनको विश्राम करने सलाह दी। नियमित रही थीं, किन्तु कुछ लाभ था। डाक्टर जो उनकी चिकित्सा कर हतप्रभ थे। चिकित्सा विवरण की जांच करते हुए, उन्होंने पूछा कि डाक्टर जी कितने बजे सोते हैं? मैंने उत्तर दिया ‘सदैव के समान रात्रि में एक डेढ़ यह सुनकर स्तम्भित रह गए। उन्होंने कहा ये प्रगति नहीं कर रहे हैं। कदाचित् आप इन्हें जल्दी सोने नहीं देते हैं। इनको दस बजे तक अवश्य सो जाना स्वीकार किया कि मैं उनको इतनी जल्दी सुला डाक्टर ने कहा- यदि आप ऐसा कर तो स्वयं आऊंगा और ऐसा करूंगा। मैंने उनके प्रस्ताव का स्वागत किया। उस दिन डाक्टर रात्रि में नौ बजे आए। डाक्टर जी ने उसी समय भोजन किया था और वे अपने कमरे में अकेले थे। क्योंकि भोजन के तुरन्त बाद सो जाना उपयुक्त नहीं था, डाक्टर ने कुछ समय लिए डाक्टर जी से गपशप शुरू कर दी। मैं उस सम्पूर्ण समय बाहर बैठा रहा। फिर जब डाक्टर को झपकी आने लगी, उन्होंने अपनी घड़ी की ओर उस समय एक बज चुका था। तुरन्त उठ खड़े हुए और डाक्टर जी को सोने के लिए कहकर बाहर निकल आए। जैसे ही वे जाने लगे, मैंने उनसे समय पूछा। एक क्षमायाचनापूर्ण स्वर में उन्होंने कहा बातचीत में मैं स्वयं ही भूल गया। और वे चले गए।


यौवन का पुष्प चढ़ाओ


अपनी गम्भीर बीमारी के काल में भी डाक्टर जी ने इस आदत को नहीं छोड़ा।

वे कार्यकर्ताओं को रात में बुलाते और उनसे एक-एक करके अथवा एक साथ बहुत रात तक बातें करते रहते । कार्य को अत्यन्त तीव्र गति से बढ़ाने के उनके कठोर के सामने कठोर परिश्रम से उन्हें परावृत्त करने के हमारे समस्त प्रयास विफल हुए। उनका लौह शरीर भी उनके प्रखर क्रियाशील व्यक्तित्व का बहुत समय तक साथ सका। संगठन के प्रारम्भ के १५ वर्षों में ही उनका शरीर आदर्शवाद की द्वारा पूर्णतया भस्म किया जा चुका था। ऐसा नहीं था कि वे अन्त से थे। वे तो कहा करते थे- ‘मैं अपनी व्याधि की प्रकृति को अच्छी प्रकार जानता हूं। मैं उसका उपाय भी जानता हूँ। परन्तु मेरे पास उपचार के हेतु बचाने के लिए समय ही नहीं है। मुझे इसके परिणाम की भी कल्पना है। परन्तु मैं विवश हूं। ईश्वर की इच्छा ही बलवान है ।

जिस प्रकार एक योगी अपने शरीर में अभिव्यक्त योग की अग्नि में स्वयं को आहुति स्वरूप अर्पित करने में ही पूर्णता का अनुभव करता है, उसी प्रकार डाक्टर जी ने अपने शरीर को यंत्रणा तथा त्याग की अग्नि में समर्पित कर दिया था। यही हमारी गौरवमयी परम्परा रही है। परन्तु आजकल हम लोग बहुधा सुनते हैं कि हमें अपने तारुण्य में बहुत अधिक श्रम नहीं करना चाहिए जिससे कि हमारा जीवन काल छोटा न रह जाय । वृद्धायु में कुछ और अधिक वर्ष घसीटने मात्र के हेतु यौवन के मूल्यवान क्षणों को व्यर्थ नष्ट करने के परामर्श का डाक्टर जी उपहास करते थे । हमें वस्तुतः स्वयं को माता की वेदी पर उसी उमय अर्पित करना चाहिए जब यौवन का पुष्प पूर्णतया विकसित हुआ हो और चारों ओर सुगन्ध तथा आभा विकीर्ण कर रहा हो। आभा तथा सुगन्ध से रहित मुरझाये हुए पुष्प को अपने इष्ट-देव की पूजा में अर्पित करना एक अपवित्र व्यवहार होगा । यह थी मानव जीवन की उपयोगिता की उनकी कल्पना । वे इसी प्रकार जिये और इसी प्रकार उनकी मृत्यु हुई।


जीना और मरना


उनकी मृत्यु सामान्य नहीं थी। वह एक सतत तथा क्षयकारक अग्नि थी जो उनके सम्पूर्ण जीवन काल में व्याप्त थी। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हौतात्मय के आवेश में अपना जीवन बलिदान कर देते हैं। निःसन्देह यह भी गौरवमय तथा प्रेरणादायक होता है। परन्तु असंख्य अन्य हृदयों को प्रज्ज्वलित करने के लिए अपने जीवन को प्रत्येक क्षण जलाना सचमुच ही सर्वोच्च प्रकार की तपस्या है। प्राचीन काल के शिवि के समान उन्होंने समाज के ‘कपोत’ की प्राण-रक्षा लिए अपने स्वयं का मांस टुकड़े-टुकड़े करके काटा। दधीचि के समान, जिन्होंने वृत्रासुर दैत्य को मारने के लिए वज्र के निर्माण हेतु अस्थियां दे डालीं, डाक्टर जी ने भी मुस्कुराते हुए अपना जीवन रक्त की अन्तिम बूंद तक समाज में संचारित किया। इसी प्रकार शंकराचार्य ३२ वर्ष की आयु में, विवेकानन्द ३६ वर्ष में, शिवाजी ५० वर्ष में। डाक्टरजी भी ५० वर्ष की आयु में दिवंगत हुए। और, ऐसे ही लोग अमर होते हैं।


शब्दों में शक्ति-संचार कैसे होता है?


ऐसी महान् आत्माओं द्वारा उच्चरित शब्दों में अप्रतिकार्य शक्ति का संचार हो. जाता है। डाक्टर जी के शब्द अत्यन्त सरल हुआ करते थे मानो कि वे बच्चे से बात कर रहे हों। परन्तु उनमें कितनी शक्ति सन्निहित हुआ करती थी। एक बार स्मरणीय श्रद्धास्पद डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी कुछ गम्भीर समस्याओं पर विचार-विमर्श की इच्छा से डाक्टर जी से मिलने आये। उस समय डाक्टरजी अत्यधिक बीमार थे और वह उनकी अन्तिम बीमारी सिद्ध हुई तथा वे अधिक समय तक बातचीत करने की स्थिति में नहीं थे। इसलिए मैंने डा. मुखर्जी से निवेदन किया कि वे उस विषय पर मुझसे प्रारंभिक बातचीत कर लें और फिर कुछ शेष रह जाता है तो वे अन्तिम-उत्तर के लिए डाक्टर जी से मिल सकते हैं। वे राजी हो गए। हम दो में एक लम्बी बहस हुई। यद्यपि उनके प्रत्येक प्रश्न तथा सन्देहों का उत्तर दिया गया तो भी वे असन्तुष्ट बने रहे। तब हम डाक्टर जी के पास गये उन्होंने वही प्रश्न डाक्टर जी के सामने रखा। और डाक्टर जी ने थोड़े से शब्दों में ही उत्तर दिया जिसमें वही अर्थ सन्निहित था जो मेरे द्वारा दिए गए उत्तर में। परन्तु मैं आश्चर्यचक्ित हो गया जब मैंने डा. मुखर्जी को यह कहते हुए सुना- ‘अब मैं पूर्णतया संतुष्ट हूं। उस घटना से मुझे मेरे जीवन की एक शिक्षा प्राप्ति हुई कि व्यक्ति के चारित्र्य, तपश्चर्या और त्याग की मात्रा में ही उसके शब्दों में शक्ति का समावेश होता है। तर्क, बहस, बुद्धि के चमत्कार, सब उस सर्वोच्च शक्ति के समक्ष तुच्छ सिद्ध होते हैं।


महानता की सन्तान


जिस सबसे एक युग निर्माता की निर्मिति होती है, उसमें सर्वोत्कृष्ट होते हुए भी, वे जीवन भर एक बालक के समान बने रहे – सरल विनम्र, निराभिमानी सभी से आत्मीयता की भावना के साथ बात करने वाले, हास्यमय, विनोदी तथा अन्यों के छोटे से छोटे सद्गुणों को महत्व प्रदान करने वाले।

एक समय संघ में आने वाले कुछ वकीलों की एक साप्ताहिक बैठक में संगठन से संबंधित अनेक विषयों पर एक मुक्त तथा अनौपचारिक रूप में चर्चा हो रही थी। कोई संघ के भावी ढांचे के विषय में प्रश्न उठा रहा था, अन्य कोई एक औपचारिक केन्द्रीय समिति के निर्माण का सुझाव दे रहा था, आदि । तब अकस्मात् उनमें से एक ने प्रश्न उठाया – ‘आखिर संघ के मूल में क्या है?’ मैंने कहा -वह तो डाक्टर जी ही हैं। उस बैठक में एक वृद्ध सज्जन उपस्थित थे, जो डाक्टर जी को उनके बचपन से जानते थे। डाक्टर जी बहुधा उनके पास सुझाव तथा परामर्श लेने जाया करते थे। स्पष्टतः डाक्टर जी के विषय में मेरे शब्द सुनकर उनका हृदय भर आया । उनको यह जानकर आश्चर्य हुआ कि ‘बालक केशव’ अकस्मात् ही इतनी श्रेष्ठता प्राप्त कर चुका है। मानो उनको एक नई अनुभूति हुई। बैठक के पश्चात् वे डाकटरजी के पास गए और स्नेहसिक्त वाणी में कहा- ‘डाक्टर, तुम कितने महान गए। मैं तो अब तक तुम्हें वही पुराना बालक केशव समझ रहा था।’

विश्वमंच को सुशोभित करने वाले महानतम पुरुष अन्य लोगों को कुछ ऐसा मन्त्र-मुग्ध सा कर देते हैं जिससे वे उनकी महानता से अज्ञात रहें, उनकी उपस्थिति में संकोच न करें और वे आकर मैत्री के साथ उनसे स्वच्छन्द रूप से घुलें मिलें। में श्रीकृष्ण ने अपनी बालक्रीड़ा द्वारा गोकुल सब पर अपना जादू सा फेर दिया था। एक भी यह स्मरण नहीं रख पाता था, यशोदा तक भी नहीं, कि वह स्वयं ईश्वर के अवतार थे । एक बार जब उनके मिट्टी खाने का पता चला और यशोदा ने उनको अपना मुंह खोलने के लिए बाध्य किया, तब उन्होंने उस छोटे से गह्वर में अनन्त सृष्टियों का नर्तन देखा। वे स्तम्भित तथा अवाक् रह गईं। परन्तु यह सब क्षण भर के लिए हुआ। उस बालक कृष्ण की वही पुरानी मुस्कान, शरारत तथा छेड़खानी भरी क्रीड़ाओं ने उनको क्षणिक अनुभूति का विस्मरण करा दिया।

डाक्टर जी की निरस्त्र करने वाली सरलता ने उन सब पर जो उनके निकट आते, उनके निकटतम मित्रों तथा सहकरियों पर भी, ऐसा ही एक जादू फेर दिया था। एकाएक क्षणमात्र के लिए क्वचित् ही वे यह सोच पाते थे कि वे एक ऐसी अतिश्रेष्ठ विभूति के सम्पर्क में हैं जो लोकोद्धार के लिए शताब्दियों में कभी एक बार जन्म लेती हैं। फिर वे डाक्टरजी के साथ अपने नि:संकोच रूप में तथा लगभग समान स्तर पर मिलने-जुलने पर तथा कभी-कभी उनके साथ की गई अपनी धृष्टता पर आश्चर्यचकित एवं स्तम्भित भी हो जाते थे। परन्तु ऐसा सब क्षण भर के लिए ही होता था। पुन: डाक्टरजी की सरल, मुस्कुराती आकृति अपना जादू फेर देती और वे इस विषय में सब कुछ भूल जाते।

ऐसे थे संघ के संस्थापक, हमारे डाक्टर ! मनुष्य मात्र के जीवन्त हिन्दू आदर्श, ‘क्रियासिद्धिः सत्व भवति महतां नोपकरणैः’, (महान व्यक्ति महान कार्यों की सिद्धि बाह्य साधनों से नहीं अपितु अपनी अन्तर्निहित शक्ति के द्वारा करते हैं) इस लोकोक्ति की पूर्ण अभिव्यक्ति, सभी पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक ज्योतिपुंज- जिसके प्रकाश में वे अपने जीवन को एक गौरवमय अमर राष्ट्रीय जीवन की उपलब्धि के लिए ढाल सकें।

–  गोलवलकर गुरूजी
( बंच  ऑफ़ थॉट्स )

3 COMMENTS

  1. In our secular constitution, the nationalist RSS appears utopian in its outlook and in Dr.Hedgewar’s ideological heirs’ wishful thinking of Akhand Bharat in future. Let’s see …….
    Vande Mataram!

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