मातृभूमि-पुरातन भावना

मातृभूमि-पुरातन भावना

वास्तव में ‘भारत’ नाम ही निर्देश करता है कि यह हमारी मां है। हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुसार किसी महिला को पुकारते की सम्मानूपर्ण रीति यह है कि इसे इसके पुत्र के नाम से पुकारा जाए। किसी महिला को अमुक की पत्नी अथवा अमुक की ‘मिसेज’ कहकर पुकारना पाश्चात्य रीति है। हम कहते हैं वह रामू की मां है।’ यही बात हमारी मातृभूमि भारत के नाम के विषय में भी लागू होती है। ‘भरत’ हमारे ज्येष्ठ भ्राता हैं, जिनका जन्म बहुत काल पूर्व हुआ था। वह उदार, श्रेष्ठगुण सम्पन्न और विजयिष्णु राजा थे एवं हिन्दू पुरुषार्थ के भासमान आदर्श थे। जब किसी स्त्री के एक से अधिक पुत्र होते हैं, तब हम उसे इसकी ज्येष्ठ संतान के नाम से अथवा सबसे अधिक ख्यातिप्राप्त संतान के नाम से पुकारते हैं। भरत ख्यातिप्राप्त थे, इसलिए यह भूमि इनकी माता कही गई। भारत, अर्थात् सभी हिन्दुओं की माता।

कुछ लोग कहते हैं कि हिन्दुओं को मातृभूमि की कल्पना का ज्ञान नहीं था। वे परस्पर युद्धरत विभिन्न कुलों में विभाजित थे। देश प्रेम जो कि एक मातृभूमि के लिए भक्ति की भावना होती है, से वे अपरिचित थे। उनमे कुछ सीमा तक यह भावना थी भी तो एक विशिष्ट भू-खण्ड मात्र के लिए थी। वह हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक, संपूर्ण देश के लिए, जैसा वह आज हमें प्राप्त है, नहीं थी। आज के प्रमुख व्यक्ति भी समय-समय पर घोषणा करते रहे हैं कि यह हमारा एक महाद्वीप अथवा उपमहाद्वीप है, जिसमें विभिन्न प्रकार की जलवायु और विभिन्न प्रकार की भूमि है। यह राष्ट्रों का झुण्ड है, और एक देश कहलाने योग्य नहीं है। वे विचित्र विश्वास हमारे राष्ट्र के मस्तिष्क में किस प्रकार फैले ?

कुटिल, विदेशी अंग्रेज ने अपने अंतस्थ साम्राज्यवादी प्रयोजनों की सिद्धि के लिए हमारी जनता में इस प्रकार के सभी दुष्ट विश्वास प्रचारित किए, जिससे देशभक्ति की भावना एवं अपनी मातृ-भूमि के समग्र व्यक्तित्व के प्रति कर्तव्य की भावना का ह्रास हुआ। उसने यह प्रच्छन्न रूप से कुटिलतापूर्वक प्रचार किया कि हम कभी एक राष्ट्र नहीं थे या हम कभी इस भूमि की संतान नहीं थे, अपितु हम नवोदित हैं, जिनका इस देश पर आक्रांताओं के झुण्डों में आने वाले मुसलमान और अंग्रेजों से अधिक अधिकार नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि इस देश का तथाकथित शिक्षित जन इस चला में फंस गया।

किन्तु वास्तविकता तो यह है कि पश्चिम ने जब कच्चे मांस के स्थान पर भुना मांस खाना सीखा था, उससे बहुत पूर्व हम राष्ट्र थे और थी हमारी एक मातृभूमि तथा समुद्रपर्यंतभूमि में परिव्याप्त था एक राष्ट्र।

‘पृथिव्यायै समुद्रपर्यंताया एकराष्ट्र’

हमारे वेदों का यह एक प्रिय उद्घोष है, युगों से हमारे सामने इसका स्पष्ट स्वरूप रहा है ‘आसेतुहिमालय’ । हमारे पूर्वजों ने बहुत काल पूर्व कहा है –

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।

(विष्णु पुराण २-३-१, ब्रह्म पुराण १६-१)

(पृथ्वी का वह भू-भाग, जो समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में है, महान भारत कहलाता है तथा इसकी संतानों को भारतीय कहते हैं।)

हिमालय उत्तर, दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिम में फैली अपनी शाखा-प्रशाखाओं के साथ तथा इन महती शाखाओं के अंतर्गत प्रदेशों के साथ हमारा रहा है। धार्मिक एवं अन्य भावुकताओं को छोड़कर यह एक शुद्ध व्यावहारिक व सामान्य बुद्धि की बात है कि कोई भी शक्तिशाली और बुद्धिमान राष्ट्र पर्वतों की चोटियों को अपनी सीमा नहीं बनाएगा। यह तो उसके लिए आत्मघाती होगा । हमारे पूर्वजों ने हिमालय के उत्तरांचल में हमारी तीर्थयात्राओं के लिए अनेक स्थानों की स्थापना कर उन भू- भागों को जागृत सीमा का स्वरूप प्रदान किया था। तिब्बत या त्रिविष्टप, जिसे आज हमारे नेता चीन का तिब्बतीय प्रदेश कहते हैं, देवताओं का स्थान था। कैलाश पर तो परमेश्वर का निवास है। मानसरोवर तीर्थयात्रा के लिए एक अन्य पवित्र स्थान था, जो हमारी गंगा, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र जैसी पवित्र नदियों का उद्गम माना जाता है। हमारे महान राष्ट्रकवि कालिदास ने हिमालय का वर्णन इस प्रकार किया है:

अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयों नाम नगाधिराज:।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः । ।

(कुमारसंभव, प्रथम सर्ग-१)

उत्तर दिशा में देवतात्मा हिमालय नाम का पर्वतराज है, जिसकी भुजाएं पूर्व और पश्चिम में समुद्रपर्यन्त फैली हुई हैं और जो पृथ्वी के मानदण्ड की तरह स्थित हैं। हमारे राजनीति शास्त्र में जिनका वचन आप्त प्रमाण है, उन चाणक्य का वक्तव्य है –

हिमवत्सुद्रान्तरमुदीचीनं योजनसहस्रपरिमणाम्

(उत्तर में समुद्र से हिमालयपर्यन्त इस देश की लम्बाई एक सहस्र योजन है)।

इसका अर्थ यही है कि कवि कालिदास का वर्णन राजनीति-विषारद चाणक्य के वक्तव्य के अनुरूप है और हमारे लिए हमारी मातृभूमि की विशालता का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है।

महान् चित्र

हमारे महाकाव्य तथा पुराण भी हमारी मातृ-भूमि की वैसी ही विशाल मूर्ति उपस्थित करते हैं। अफगानिस्तान हमारा प्राचीन उपगणस्थान था। महाभारत का शल्य वहीं का था। वर्तमान काबुल और कन्दहार, गंधार थे। कौरवों की माता गांधारी वहीं की थी। ईरान तक मूलत: आर्यभूमि ही है। इसका अंतिम राजा रजा शाह पहलवी इस्लाम से अधिक आर्य सिद्धान्तों का अनुसरण करने वाला था। पारसियों का पवित्र ग्रंथ ‘जेंदा वेस्ता’ बहुत कुछ ऋग्वेद है। पूर्व दिशा में बर्मा हमारा ब्रह्मदेश है। महाभारत में इरावत का उल्लेख आया है, वर्तमान इरावदी घाटी का महायुद्ध से संबंध था। महाभारत में असम का उल्लेख ‘प्राग्ज्योतिश’ के नाम से हुआ है, क्योंकि सूर्य का प्रथमोदय वहीं होता है। दक्षिण में लंका भी निकटतम सूत्र में आबद्ध है और इसे कभी भी मुख्य भूमि से भिन्न नहीं माना गया।

यह था हमारी मातृभूमि का चित्र, जिसमें हिमालय के पश्चिम में आर्यान (ईरान) तथा पूर्व में शृंगपुर (सिंगापुर) की ओर दो समुद्रों में अपनी दोनों भुजाओं को अवगाहित कर रहा है। साथ ही दक्षिण महासागर में उसके पवित्र चरणों पर चढ़ाई गई कमल की पंखुड़ी के समान विद्यमान है लंका (सीलोन)। मातृभूमि का यह चित्र सहस्रों वर्ष से सतत हमारे जनमानस में दैदीप्यमान है। आज भी हिन्दू, प्रतिदिन स्नान करते हुए गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी जैसी पवित्र नदियों का आह्वान करता है –

गंगे च यमुने चैव, गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ।।

(हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी तुम्हारा जल हमारे इस स्नान के जल में सम्मिलित हो।)

यह भी भक्ति का एक पाठ है, क्योंकि इसके द्वारा हमें यह अनुभूति कराई जाती है कि इन पवित्र नदियों के एक बूंद जल में भी हमारे समस्त पापों को धो डालन की शक्ति है।

हमारी जाति के एक महानतम व्यक्ति रामचन्द्र जी थे, जिन्होंने इस जाति चरित्र एवं संस्कृति पर एक अमिट छाप छोड़ी है। उनके महान् गुण, यथा निराकुल उदारचितता, ज्ञानगांभार्य एवं अनुभूतियों की तुलना समुद्र की अप्रमेय गहराई तथा शांतता से की गई है और उनकी अदम्य शक्ति एवं धैर्य की तुलना महान् और अजेय हिमालय से की गई है-

‘ समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवान इव ’

(वाल्मीकि रामायण, बालकांड, प्रथम सर्ग, श्लोक १७)

क्या हमें ज्ञात नहीं कि हमारी मातृभूमि एक ओर हिमालय से और शेष तीन ओर समुद्र से परिवेष्टित है? इस प्रकार राम के आदर्श व्यक्तित्व में हमारी मातृभूमि को उसकी संपूर्णता में दृष्टिगत कराया गया है। अनेक प्रकार से हमारी इस समग्र अखंड मातृभूमि को पूजनीय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके खंडित होने का कोई भी विचार हमारे लिए असह्य है।


– माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर ,

विचार नवनीत

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